भागवत गीता और सुन्नत
सुन्नत
(नीति )
सुन्नत अरबी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है
"नीति"। अल्लाह की नीतियाँ और उनके द्वारा प्रदत्त अवतार या पैगंबर की नीतियों
का अनुसरण सुन्नत कहलाता है । कुछ लोग विशेष रूप से सुन्नत का अर्थ "खतना" समझते हैं, जो की गलत है । इस्लामिक
दृष्टिकोण में सुन्नत का आशय है " दीन-ए-इब्राहिम अलैहिस्सलाम की वो परंपरा,
जिसमें पैगंबर मुहम्मद सल्ल॰ ने अल्लाह की आज्ञा के बाद "सुधार
कर कुछ नए विचारों के साथ" अपने अनुयायियों में जारी किया ।"
गीतानुसार सुन्नत
यद्यदाचरति
श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
(गीता-03:21)
भावार्थ
महापुरुष
जो जो आचरण करते हैं, सामान्य व्यक्ति उसी का अनुसरण करते हैं । वह जो कुछ भी प्रमाण छोड़ जाते हैं, सम्पूर्ण विश्व को उसी के अनुकूल अपना आचरण
करना चाहिए ।
तात्पर्य
सामान्य
लोगों को सदैव एक ऐसे नेता की आवश्यकता होती है, जो व्यावहारिक आचरण द्वारा जनता को शिक्षा दे सके । जो इस प्रकार शिक्षा देता है
वह आचार्य या आदर्श शिक्षक कहलाता है । अतः शिक्षक को चाहिए की सामान्यजन को
शिक्षा देने के लिए स्वयं शास्त्रीय सिद्धान्तों का पालन करे । कोई भी
शिक्षक प्राचीन प्रमाणिक ग्रंथों के नियमों के विपरीत कोई नियम नहीं बना सकता । जो व्यक्ति अपनी उन्नति चाहता
है उसे महान शिक्षकों द्वारा अभ्यास किये जाने वाले आदर्श नियमों का पालन करना
चाहिए ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि "श्रेष्ठ
पुरूष- अवतार,ईशदूत,रसूल या पैगंबर" जो-जो आचरण कर गए हैं, अन्य
पुरूषों को भी वैसा-वैसा ही आचरण करना चाहिए तथा ये भी ध्यान रहे कि इन आदर्श
पुरुषों द्वारा जो भी प्रमाण हमारे लिए छोड़ा गया है हमारा कार्य इसके अनुकूल हो ।
अरबी भाषा में इसी अनुसरण को सुन्नत कहते हैं ।

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