मार्गदर्शक: पवित्र क़ुरआन तो मानव जाती की पुस्तक है |: जिस प्रकार प्रकृती और उसकी समस्त वस्तुएं सबके लिए समान होती है वैसे ही धर्म तथा इसकी शुभ शिक्षाएं सबके लिए समान होती है | धर्म एक ऐसी...
शुक्रवार, 3 जुलाई 2015
पवित्र क़ुरआन तो मानव जाती की पुस्तक है |
जिस प्रकार प्रकृती और उसकी समस्त वस्तुएं
सबके लिए समान होती है वैसे ही धर्म तथा इसकी शुभ शिक्षाएं सबके लिए समान होती है
| धर्म एक ऐसी रस्सी है जो समस्त मानवों को ईश-भय से बाँधती है शायद इसलिए मनुष्य
ईश-भय कि इस पवित्र रस्सी से स्वयं को बाँधता हुआ इस धरती पर एक सभ्य तथा भद्र
समाज का निर्माण करता है | एक सभ्य समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए
विधि-वयवस्था कि आवश्यकता पड़ती है जिसके दम पर मानव इस खुले आकाश के नीचे अपने
पूर्ण अधिकारों के साथ स्वतंत्र एवं शांत रहता है | परन्तु अगर कोई मानव को उसके
इस अधिकार से वंचित कर दे तो ऐसा करना मेरी दृष्टिकोण में उस मानव तथा उसके समाज
पर अत्यचार है | इसी सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि क्या हिन्दुओं का
इश्वर,मुसलमानों का खुदा, ईसाईयों का गॉड इत्यादि सब अलग-अलग सत्ता है या एक ही
सत्ता है जिसे अलग अलग नामों से जाना और पुकारा जाता है जब सत्ता एक है तो उसका
सन्देश भी एक ही होगा चाहे लोग कुछ भी कहते रहें | धर्म की पवित्र पुस्तकें उसी
धर्म विशेष के मानने वालों के लिए होती है या समस्त मानव तथा मानव समाज के कल्याण
के लिए होती है ? रमजान के इस पावन बेला में आज जिस विषय पर चर्चा है वह ये है कि
क्या पवित्र कुरआन मजीद केवल मुसलमानों कि पुस्तक है या गैरमुस्लिमों कि इस पर
चर्चा इसलिए ज़रूरी है कि बहुत सारे मुस्लिम को ग़लतफ़हमी है कि क़ुरआन गैरमुस्लिमों
को नहीं देना चाहिए |
ऐसे नाज़िल हुआ क़ुरआन
सऊदी अरब के मक्का शहर के निकट एक पहाड़ के गुफा
में जिसका नाम गारे हिरा है अल्लाह के देवदूत हजरत जिब्राइल द्वारा मुहम्मद सल्ल०
को सन 610 ई०में पहली बार मौखिक क़ुरआन सुनाया गया | क़ुरआन का अवतरण आवश्यकतानुसार
होता था इसलिए पूरा क़ुरआन 23 वर्षों कि लम्बी अवधि में नाज़िल हुआ अर्थात 632 ई०
में मुहम्मद सल्ल०के मृत्यु से पूर्व पूर्ण हुआ | क़ुरआन में कुल 114 अध्याय हैं
जिन्हें सूरह कहते हैं | हर अध्याय में कुछ मंत्र हैं जिन्हें आयत कहते हैं | मुहम्मद
सल्ल० के मृत्यु के बाद सन 633 ई० में इसे पहली बार लिखा गया | तीसरे खलीफ़ा हजरत
उस्मान रज़ि० ने अपने सत्ता समय में हजरत सिद्दिके अकबर द्वारा संकलित क़ुरआन मजीद
की नौ प्रतियाँ तैयार करके कई देशों में भेजा था उनमें से दो क़ुरआन कि प्रतियाँ आज
भी सुरक्षित हैं एक ताशकंद में तथा दूसरा तुर्की में | किसी भी भू-भाग से क़ुरआन
लीजिये और उसे इन प्राचीन युग कि प्रतियों से मिलाइये स्पष्ट हो जाता है कि इस
धरती पर उपस्थित प्रत्येक क़ुरआन की प्रति वही मूल प्रति का प्रतिरूप है जो मुहम्मद
सल्ल० पर अवतरित हुई थी | क़ुरआन पर आस्थावान का छः हक़ है - १. ईमान
(आस्था) -2:165,२. तिलावत (पाठ) – 2:121, ३. समाअ (सुनना) – 7:204, ४. गौर-फ़िक्र–
47:24, ५. अमल – 25:30, ६. तब्लीग (प्रसार) – 5:67 |
क़ुरआन सबका है
धर्म को लेकर मानवों ने
सदैव ये भ्रान्ति बनाई कि जो जिस धर्म का है उसे केवल उसी धर्म कि पावन पुस्तक का
पाठ करना चाहिए ,उस धर्म के प्रवर्तकों महान आत्माओं का हीं केवल आदर करना
चाहिए तथा उसे केवल अपने धर्म स्थलों में
ही जाना चाहिए | मानवों के इस विधि-वयवस्था ने मानवों के बीच नफरत कि एक ऐसी लकीर
खींच दी जिसका उलंघन रक्त कि नदियों में बदल गया और धर्म नफरत के इस बदबूदार रक्त
में डूब गया | जबकि धर्म ने सदैव आवाज़ लगायी कि तुम सब एक माता-पिता कि संतान हो
तुम सब आपस में भाई- भाई हो परन्तु हमारा अहंकार और झूठी शान ने हमें अपने
परमेश्वर के सामने मुजरिम बना कर जवाबदेही हेतु खड़ा कर दिया है बहरहाल बात क़ुरआन
कि हो रही है क़ुरआन ने इस भ्रान्ति को समाप्त करने हेतु उपाय सुझाते हुए कहा है “
ऐ नबी ! कहो हम परमेश्वर को मानते हैं,उस शिक्षा को मानते हैं जो हम पर उतारी गई
है,उन शिक्षाओं को भी मानते हैं जो इब्राहीम, इस्माइल, इसहाक़, याक़ूब और याक़ूब की
संतान पर उतरी थीं और उन आदेशों को भी मानते हैं जो मूसा और ईसा और दूसरे
पैगम्बरों को उनके रब कि ओर से दिए गए,हम उनके बीच अंतर नहीं करते और हम परमेश्वर
के आज्ञाकारी हैं ” (03:84) | पुरे क़ुरआन में ये कहीं वर्णित नहीं है कि क़ुरआन
केवल मुसलमानों कि पुस्तक है अपितु क़ुरआन में वर्णित है “ऐ नबी ! हमने
सारे इंसानों के लिए यह किताब हक के साथ तुम पर उतार दी है”(क़ुरआन-39:41)
| इसी प्रकार क़ुरआन में एक जगह और वर्णित है “रमजान वह महीना है
जिसमें क़ुरआन उतारा गया जो इंसानों के लिएसर्वथा मार्गदर्शन है और
ऐसी अस्पष्ट शिक्षाओं पर आधारित है,जो सीधा मार्ग दिखाने वाली और सत्य असत्य का
अंतर खोल कर रख देने वाली है”(क़ुरआन-02:185) |
गुरुवार, 2 जुलाई 2015
आतंकवाद घिनौना अपराध
आतंकवाद मानवता के सीने में घुसा हुआ ऐसा अस्त्र
है जो न तो सुकून से जीने ही देता है और ना ही सुकून से मरने | बहुत से मुसलमान
ऐसे हैं जो इस्लामिक शिक्षाओं से अवगत नही हैं इसी इस्लामिक शिक्षा-हीनता के कारण
हीं बहुत से मुस्लिम नौजवान इस तथ्य से बहका लिए जाते हैं कि अल्लाह के लिए उसके
दीन के लिए और उसके आखरी नबी सल्ल० के लिए स्वयं को मिटा दो,इस राह में स्वर्ग का
वास्तविक अधिकारी वो है जो समस्त कठिनाइयों को सहते हुए स्वयं के शरीर का त्याग कर
दे तो उसका ये त्याग असफल नही होगा अपितु वह शहादत का दर्जा पायेगा अल्लाह और उसके
रसूल सल्ल० के निकट शहीद कहलायेगा | इस शहादत और स्वर्ग कि कामना में वो नौजवान
स्वयं को आतंकवाद के हाँथो बेच डालता है और आरम्भ हो जाती है रक्त रंजित
खेल,उपद्रव एवं भय फैलाने कि नीति | प्रत्येक आतंकवादी घटनाओं के तुरंत बाद उस
घटना पर इस्लाम नाम कि चादर ओढ़ा दी जाती है और कह दिया जाता है कि इस्लाम का
अल्लाह,उसका कुरआन,उसका नबी सल्ल०क्रूर एवं निर्दयी है | इस्लाम के आवरण में
सुसज्जित ढोंगी राजनीतिज्ञ एवं ढोंगी धर्म गुरु होते हैं जो इस्लाम को बजाहिर
क्रूरता के द्वार पर ला खड़ा करते हैं और हम मुसलमान उसे मूक दर्शक बन कर देखते
रहते हैं इस तथ्य से हर मुस्लिम भीज्ञ है कि इस्लाम मानवता कि सुरक्षा के लिए आया
है परन्तु आज मुसलमान के गलतियों के कारण इस्लाम को मानवता का शत्रु कहा जाता है |
कुरआन सुरह अशशूरा आयत सैंतीस से तेंतालीस तक में मुसलमानों को शिक्षा इस प्रकार
दी गयी है- जो बड़े-बड़े गुनाहों और अशलील कर्मों से बचते हैं और अगर गुस्सा आजाये
तो माफ़ कर देते हैं, जो अपने रब का आदेश मानते हैं,नमाज़ कायम करते हैं,अपने मामले
आपस के परामर्श से चलाते हैं,हमने जो कुछ भी रोज़ी उन्हें दी है उसमे से खर्च करते
हैं और जब उनपर ज्यादती की जाती है तो उसका मुकाबला करते हैं,बुराई का बदला वैसे
ही बुराई है,फिर जो कोई माफ़ करदे और सुधार करे उसका बदला अल्लाह के जिम्मे है,
अल्लाह जालिमों को पसंद नहीं करता और जो लोग ज़ुल्म होने के बाद बदला ले तो उनकी
निंदा नही कि जा सकती,नींदनीये तो वे है जो दूसरों पर ज़ुल्म करते हैं और धरती में
नाहक ज्यादती करते हैं | ऐसे लोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब है | अलबत्ता जो व्यक्ति
सब्र से काम ले और माफ़ करे,तो वह बड़े साहस पूर्ण कामों में से है | महान है अल्लाह
! इस आयत से धार्मिक उदारता का श्रोत प्रवाहित हो रहा है, लेकिन क्या हम उस पवित्र
आदेश पर विश्वास रखते हैं ? नहीं नहीं ! हम तो बात-बात पर क्रोधित हो जाते हैं |
शायद किसी को ख़याल हो कि व्यक्तिगत दुर्व्यवहार या कष्ट सहा जा सकता है, किन्तु
यदि धर्म पर आक्रमण हो तो उसे सहन नहीं किया जा सकता,तो मैं ऐसे भाइयों कि इस
धार्मिक भावना पर कुर्बान जाऊँ | किन्तु एक बात मेरी समझ में नहीं आता कि किसी
धर्म के अनुयायी के लिए उसी धर्म के आदेशों के विरुद्ध काम करना कहाँ तक धर्म का
पालन या धर्म का सम्मान कहा जा सकता है ?आप के समक्ष है हाल ही में घटित घटना
चार्ली एब्दो कि जिसका जुर्म सिर्फ इतना था कि इसने महान मुहम्मद सल्ल०का कार्टून
बनाया था ये लोग इस बात से अवगत नहीं कि जिस नबी सल्ल० का कार्टून बनाया गया वो
उसके भी नबी थे सुरह अल आराफ आयत एकसौ अंठावन में वर्णित है –" ऐ मुहम्मद सल्ल०!
कहो ऐ इंसानों मैं तुम सब कि ओर उस अल्लाह का पैगम्बर हूँ " स्पष्ट है कि जितना
अधिकार एक मुसलमान का मुहम्मद सल्ल० पर है उतना ही अधिकार समस्त इंसानों का भी है
विशेष रूप से उन कार्टूनिष्टो का भी जिनकी निर्मम हत्या के उपरान्त उनके शवों पर
ये आवाज़ गुंजायमान की गयी “ हमने अपने नबी के अपमान का बदला ले लिया है ” ऐ मेरे
भाई अल्लाह ने इस्लाम के सच्चे अनुयायी को अधिक नम्रता,सहनशीलता और उच्च आदर्शिता
से काम लेने का आदेश दिया है सुरह अल मोमिनून आयत छियानवे में आदेश है- "यदि कोई
तुम्हारे साथ बुराई करे तो बुराई को ऐसे व्यवहार से मिटाओ जो बहुत ही अच्छा हो | ऐ
पैगम्बर जो कुछ वे तुम्हारे बारे में कहते हैं,वह हमको भली भांति मालूम है |" एक और
आदेश देखिये सुरह अल क़सस आयत चउव्वन में है- "बुराई को भलाई से दूर करो |" कितनी
पवित्र और कितनी उत्तम शिक्षा है प्रायः गैर मुस्लिम भाई , बल्कि मुस्लिम भाई भी
यह समझते हैं कि इस्लाम में बुराई के बदले भलाई करने का कहीं आदेश नहीं वो भाई इस
आदेश को आँखें खोल कर देखें और अपनी अज्ञानता को दूर करें | मैं समझता हूँ आज के सांप्रदायिक दंगे,निर्दोष
व्यक्तियों कि हत्या पवित्र कुरआन की शिक्षा से उदासीनता दिखाने का परिणाम है |
यदि इश्वरिये आदेश को सदा सामने रखा जाए तो यह अत्याचार,दंगे,उपद्रव,खून-खराबा
पूरी तरह समाप्त हो सकते हैं|
बुधवार, 1 जुलाई 2015
मज़हब प्रेम का पक्षधर
मज़हब प्रेम सिखाता है
फिरका परस्ती,
धार्मिक उन्माद, धर्मांधता आदि अनेक शब्दों के प्रचार-प्रसार से ऐसा आभास मिलता है
कि वर्तमान में समस्त सामाजिक बुराइयों का स्रोत मज़हब या धर्म है | सारी अशांति और
अव्यवस्था मज़हब या धर्म की उपज है | परन्तु मज़हब का यह दावा है कि वह समस्त
अप्राकृतिक भेद-भावों को समाप्त करके आदर्श मानव तथा आदर्श समाज की रचना करना
चाहता है | मज़हब का सन्देश एक ही है जो सत्य है और अटल है,मज़हब समय की कसौटी पर
खरा है क्योंकि मज़हब की निर्मल धारा को प्रवाहित करने वाला परमेश्वर जो हज़ारों वर्ष
पहले था वही आज भी है और कल भी रहेगा, वही एक अमर है | मज़हब का अर्थ है शुद्ध आचरण
का ग्रहण तथा बुरे आचरणों का त्याग | मज़हब की दृष्टि में समस्त मानव एक समान है
यहाँ कोई छोटा या बड़ा नहीं होता | यहाँ सब का आदर, सम्मान तथा सत्कार बराबर होता
है | मज़हब आपसी भाईचारगी पर बल देता है, दूसरो के लिए मर-मिटने की प्रेरणा तथा
दूसरों की पीड़ा को समझने का एहसास देता है | आज का विषय इसी एहसास पर टिका है
पवित्र कुरान इस विषय में कहता है “अल्लाह तुमको आदेश देता है न्याय का,सद्व्यवहार
का,नातेदारों का हक़ अदा करने का,और मना करता है बुराई एवं अश्लीलता से, अत्यचार
एवं ज्यादती से | वह तुम को प्रेरणा देता है ताकि तुम शिक्षा लो (क़ुरआन-16:90) |”
सारे मनुष्य भाई-भाई
हैं
“या अय्युहन्नासु
इन्ना ख़लक़नाकुम मिन ज़करिउं व उन्सा” हे मनुष्यों ! हमने तुम सबको एक ही पुरुष और
स्त्री से पैदा किया है (क़ुरआन-49:13) | ज्ञात हुआ धरती का हर मनुष्य एक दूसरे का
भाई है सब एक ही माता-पिता की संतान हैं | इस्लाम के अंतिम पैगम्बर मुहम्मद
सल्ल०पाँचों समय के नमाज़ के बाद सदैव पुकारा करते थे “ ऐ अल्लाह, हमारे प्रभु एवं
प्रत्येक वस्तु के प्रभु ! मैं गवाही देता हूँ कि एक तू ही प्रभु है | हे अल्लाह,
हमारे प्रभु और प्रत्येक वस्तु के प्रभु ! मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद तेरा
भक्त और तेरा संदेष्टा है | हे अल्लाह, हमारे प्रभु और प्रत्येक वस्तु के प्रभु !
मैं गवाही देता हूँ कि सारे मनुष्य भाई-भाई हैं (अहमद व अबूदाऊद) |” महाईशदूत
मुहम्मद सल्ल० ने यह नहीं बताया कि हमारा ही देश पवित्र और सभ्य है तथा दूसरे देश
के निवासी मलेच्छ और दस्यु हैं आपने अपने जीवन के अंतिम हज के अवसर पर जब पूरे अरब
देश के लोग मक्का आये थे उनसब को उपदेश करते हुए कहा “ खबरदार ! न अरबवासियों को
अन्य देशवासियों पर श्रेष्ठता है, न अन्य देशवासियों को अरबवासियों पर और न गोरों
को काले पर श्रेष्ठता है, न कालों को गोरों पर | हाँ किसी को किसी पर श्रेष्ठता है
तो केवल उनको है जो धर्म और ईश-भय के कारण दुराचरण से बचते तथा सदाचरण करने को
आतुर रहते हैं |”
भलाई का व्यवहार करो
भलाई मज़हब की
अर्धांग्नी है इसके बगैर मज़हब अधूरा है क्योंकि भलाई मानवता को जन्म देती है और
मानवता सभ्य समाज को | क़ुरआन मजीद मानवता एवं सभ्य समाज को बरकरार रखने के लिए सभी
के साथ सद्व्यवहार की शिक्षा देता है “ और परमेश्वर ही की उपासना करो और किसी
वस्तु को उसका समकक्ष न ठराओ | और माता-पिता के साथ,सम्बन्धियों के साथ,अनाथों के
साथ,निर्धनों के साथ,निकटवर्ती पड़ोसी के साथ, तथा दूरवर्ती पडोसी के साथ,और पास के
सहचरों के साथ,यात्री के साथ, तथा उनके साथ जो तुम्हारे अधीन हों, सब के साथ भलाई
का व्यवहार किया करो (क़ुरआन -04:36) |” अंतिम रसूल सल्ल० ने फ़रमाया “ जिस व्यक्ति
में तीन बातें होंगी उस पर अल्लाह अपनी कृपा का हाथ रखेगा और उसको जन्नत में
प्रवेश करेगा | निर्बलों पर नरमी करना,माँ-बाप से प्रेमपूर्ण व्यवहार करना और दास
के साथ भलाई करना (तिरमिज़ी) |” भलाई कि सीमा उस वक़्त समाप्त हो गयी जब मुहम्मद
सल्ल० ने कहा “मोमिन ऐसा नहीं होता कि स्वयं पेट भर खाए और उसका पड़ोसी चाहे
मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम जो उसके पहलू में रहता हो भूखा रहे (बुखारी,मुस्लिम ) |”
परनिन्दा से बचो
मानवता में
बैर के बीज उस वक़्त पड़ते हैं जब वो दुर्भावनाओं का शिकार हो जाता है इसके उपरान्त वो
नेक आचरणों को छोड़ बुरे आचरणों को ग्रहण कर लेता है जिसके परिणाम स्वरूप समाज मे
कलह मच जाती है | ऐसी दुर्भावनाओं से बचने हेतु और सभ्य समाज को सुचारू रूप से
चलाने के लिए क़ुरआन ने आदेश दिया है “ ऐ
आस्थावानों ! कोई पुरुष किसी दूसरे पुरुष की हंसी ना उड़ाए सम्भव है वो उनसे अच्छे
हों, और न औरतें दूसरी औरतों का हंसी उड़ाए होसकता है की वो उनसे अच्छी हों | आपस
में एक दूसरे पर व्यंग्य न करो और न एक दूसरे को बुरी उपाधि से याद करो | ईमान
लाने के बाद दुराचार में नाम पैदा करना बहुत बुरी बात है जो लोग इस नीति से बाज़ न
आये वे ज़ालिम हैं | किसी के प्रति अत्यधिक गुमान से बचो क्योंकि अनेक गुमान पाप
होते हैं और एक दूसरे की गुप्त जिज्ञासा न किया करो और न एक दूसरे के पीठ पीछे
निंदा किया करो| क्या तुममे से कोई इस बात को पसंद करता है कि अपने मुर्दा भाई का
मांस खाए | उससे तो तुम अवश्य घृणा करोगे इसलिए परनिंदा न किया करो और इश्वर का भय
रखो (क़ुरआन-49:11,12) |
आम लोगों का
ख्याल रखो
हदीस कि एक
पुस्तक मिशकात शरीफ में वर्णित है मुहम्मद साहब सल्ल० ने फरमाया “ सारी सृष्टि
अल्लाह का परिवार है ; अतः अल्लाह उस व्यक्ति को प्रिय रखता है जो उसके परिवार के
साथ भलाई करता है |” आम लोगों का ख्याल रखने के लिए हदीस में इस प्रकार वर्णन आया
है कि मुहम्मद सल्ल० ने फरमाया “ प्रलय के दिन इश्वर कहेगा कि ऐ आदम की संतान !
मैं बीमार पड़ा, परन्तु तूने मेरा हाल न पूछा | इंसान निवेदन करेगा ऐ पालनहार ! मैं
तेरा हाल कैसे पूछता ? तू तो स्वयं सारी सृष्टि का पालनहार है | इश्वर कहेगा मेरा
अमुक बन्दा बीमार हुआ परन्तु तूने उसका हाल न पूछा ! क्या तुझे मालूम नहीं कि यदि
तू उसका हाल पूछने जाता तो मुझे उसके पास पाता | फिर पूछेगा ऐ आदम की संतान !
मैंने तुझ से खाना माँगा परन्तु तूने मुझे खाना न दिया | मनुष्य निवेदन करेगा ऐ
पालनहार ! मैं तुझे भोजन कैसे देता ? तू तो स्वयं सारी सृष्टि का पालनहार है |
इश्वर कहेगा मेरे अमुक बंदे ने तुझ से खाना माँगा परन्तु तूने उसे खाना नहीं दिया
क्या तू नहीं जानता कि यदि तू उसे खाना देता तो उसका पुण्य मुझ से पाता | फिर
पूछेगा ऐ आदम की सन्तान मैंने तुझ से पानी माँगा परन्तु तूने मुझे पानी नहीं
पिलाया मनुष्य निवेदन करेगा ऐ पालनहार ! मैं तुझे पानी क्या देता ? तू तो स्वयं
सारी सृष्टि का पालनहार है | इश्वर कहेगा मेरे अमुक बन्दे ने तुझ से पानी माँगा
परन्तु तूने उसे पानी न दिया क्या तू नहीं जानता कि यदि तू उसे पानी पिला देता तो
उसका पुण्य मुझसे पाता (मुस्लिम) |”
इस प्रकार मज़हब आपसी भाईचारगी को बढवा
देता तथा एक दूसरे को आपस में प्रेम-पूर्ण भावनाओं से बांधता है | आदर्श समाज के
निर्माण में मज़हब प्रीत का ऐसा मिठास घोलता है जिसके प्रेम रूपी मीठेपन के सामने
दुर्व्यवहार,कटु-वचन,आपसी कलह,हीन भावना,परनिन्दा,सम्प्रदायिकता,द्वेष भावना जैसी
समस्त चीजें दम तोड़ देती है | शायद इसलिए अल्लामा इक़बाल ने कहा है “ मज़हब नहीं
सिखाता आपस में बैर रखना |”
इस्लाम कि दृष्टि में काफ़िर
इस्लाम कि दृष्टि में
काफ़िर
एक भाई ने कहा के मुसलमान अपने सिवा दूसरों को नगण्य समझता है तथा उनसे घृणा
करते है और इसका कारण इस्लाम की शिक्षाएं है | कुरआन मजीद के अनुकूल मुसलमानों के
अतिरिक्त जितने भी लोग है वह सब के सब ‘ काफ़िर ’ है | मुसलमान उनको काफ़िर कहते है
| इस प्रकार के विचार का परिणाम तो यही हो सकता है के मुसलमानों के दिलो में दुसरो
के प्रति नफरत और नगण्यता का भाव जन्म ले ?
मैंने उस भाई से कहा वास्तविकता तो ये है भाई की गलत ढंग से इस प्रकार की
भ्रान्ति इस्लाम और मुसलमानों से लोगो को दूर रखने के लिए फैलायी जाती है |
इस्लामी शिक्षाएं तथा मुसलमानों को इस प्रकार की फिजूल बातो से कोई संबंध नहीं है
|
इस्लामिक
दृष्टिकोण
इस सिलसिले में इस्लाम
की बुनियादी तथ्य ये है की मुसलमानों के अतिरिक्त दूसरी समस्त जातियाँ एवं
सम्प्रदाय इंसानी रिश्ते से आपस में भाई है तथा सब लोग इस्लाम को जानने हेतु आमंत्रित
है | कुरआन का आदेश है कि “ अपने रब के मार्ग की ओर तत्वदर्शिता और सदुपदेश के साथ बुलाओ और उनसे ऐसे ढंग से वाद–विवाद करो
जो उत्तम है ” (नहल - 125) | अगर आमंत्रित
व्यक्ति के साथ हमदर्दी की जगह नगण्यता का व्यवहार किया जाए तो इस्लाम का पैगाम उन तक नहीं पहुंचाया जा सकता
है | फिर किसी मुसलमान के लिए उनकी गुंजाईश कैसे निकल सकती है की वो अपने सिवा
हिन्दू को नगण्य जाने ऐसी परिस्थिति में तो वो इस्लाम के आमन्त्रण की बुनियाद ही
खो डालेगा | इस्लाम का दूसरा दृष्टिकोण ये है की चाहे कोई हिन्दू हो या मुसलमान वह
सब के सब एक ही पिता आदम की संतान है तथा आपस में भाई - भाई है |
इस्लाम और
मुसलमानों के निकट कुफ्र का अर्थ :-
पवित्र कुरआन मजीद एवं
हदीस तथा अरबी शब्दकोष में ‘कुफ्र’ का अर्थ “इनकार और छुपाने” का है, इसी शब्द
कुफ्र से बना है “काफ़िर” अथार्त छुपाने वाला शब्द काफ़िर बहुत से अर्थो में प्रयोग
हुआ है | अरबी भाषा में किसान को भी काफ़िर कहते है, कुरआन मजीद सुरः अलहदीद आयत
बीस में किसान का चर्चा हुआ है, क्योंकि किसान बीज को ज़मीन में छुपाता है | इसी
तरह रात्रि को भी काफ़िर कहते है क्योंकि रात अपने अँधेरे में संसार की समस्त
वस्तुओं को छुपा लेती है , समुन्द्र का दूसरा तट जो नजरो से ओझल है उसे भी काफ़िर
कहते है | कुरआन मजीद सुरः अलमुमतहिना आयत चार में इस्लाम धर्म के एक पैगम्बर हजरत
इब्राहीम (अ०स०) ने स्वयं को काफ़िर कहा है इब्राहीम (अ०स०) और उनके साथियों ने जब
अपने कौम को फसादी रास्तों में उलझा हुआ पाया तो उन्होंने कहा तुम और तुम्हारे
फसादी रास्तों से हम बरी हैं एवं तुम्हारे फसादी रास्तों का हम पूरी तरह इन्कार
करते हैं, यहाँ पर कुफ्र का शब्द इनकार के अर्थ में प्रयोग हुआ है | बिहार के
प्रसिद्ध सूफी बुजुर्ग हजरत यहया सरफुद्दीन मनेरी (र०अ०) ने अपनी पुस्तक “मक्तुबाते
सदी” में लिखा है कि सुफियाओं की भाषा में “काफ़िर” खुदा के प्रेम तथा शास्त्र की
बात छुपाने वाले को कहते हैं, तथा “मुसलमान” इसे जाहिर और ऐलान करने वाले को कहा
जाता है | एक प्रसिद्ध सूफी कवि अमीर खुसरू स्वयं को ‘कफिरे इश्क’ करार देते हुए
फ़ारसी में कहते हैं :-
“ कफिरे इश्कम मुसलमानी
मोरा दरकार नेस्त , हर रगे जाँतार गुशः हाजत जेनार नेस्त ”
अथार्त में काफिरे इश्क
हूँ क्योंकि मैं खुदा की मुहब्बत को अपने छाती में छुपाये रहता हूँ ,मुझे मुसलमान
बनने की आवश्यकता नहीं क्योंकि मैं खुदा से की गई पाक मुहब्बत के जज्बात को ऐलान
करना मुनासिब नहीं समझता , जब मैं जान चुका हूँ कि मेरे रग में लहू बनकर खुदा के
इश्क की लहर दौड़ रही है तो मुझे दिखने वाली जनेऊ के तारो को लपेटने की क्या
आवश्यकता है | इसके अतिरिक्त उर्दू काव्य में “काफ़िर प्रेमिका को कहा जाता है ”
क्योंकि वह प्रेम देने का प्रण करके शर्माते हुए इनकार करती है |
इस प्रकार कहा जा सकता
है कि शब्द “कुफ्र एवं काफिर ” में नगण्यता का भाव नही है अगर ऐसा भाव इस शब्द में
विराजमान होता तो ना तो मुसलमान ही शब्द काफिर की संज्ञा स्वीकार करता और ना तो
इस्लाम के एक उच्च कोटि के पैगम्बर हजरत इब्राहीम (अ०स०)को पवित्र क़ुरान मजीद में
काफिर की संज्ञा से अभिहित किया जाता और ना हि सूफी मत के निकट शब्द काफिर प्रेम
का पात्र बन पाता | हिन्दुस्तान के एक बड़े इस्लामिक धर्मगुरु मौलाना अशरफ अली
थानवी (र०अ०) कहा करते थे :- “ मैं मुसलमानों को ‘हालन’ (वर्तमान में) और हर काफ़िर
को ‘एह्तेमालं’ श्रेष्ठ समझता हूँ | एह्तेमलं का अर्थ ये है कि इस समय वो अल्लाह
और उसके आदेश को अस्वीकार कर रहा है परन्तु क्या पता कि भविष्य में अल्लाह ताला उसको तौबा करने का मार्ग
प्रशस्त कर दे जिससे वो कुफ्र एवं काफिर की मुसीबत से निकल जाये तथा अल्लाह ताला
उसकी प्रतिष्ठा इतनी बढ़ा दे कि वह मुझ से भी आगे निकल जाये” |
इन तथ्यों से स्पष्ट है की किसी को नगण्य समझते हुए “काफ़िर”
कहना उल्माए इस्लाम (इस्लामिक धर्मगुरु) तथा मुसलमानों का दस्तूर नहीं है | जिन
लोगो को शब्द “काफ़िर” से गलत फहमी पैदा हुई है उसकी असल वजह ये है कि इस्लामिक
शिक्षा और मुसलमानों के व्यवहारिक जीवन का उन्होंने स्वयं अध्ययन नहीं किया अपितु
सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा कर के ऐसा समझ बैठे |
काफिर
को गाली ना दो
पवित्र कुरान मजीद ने संसार के समस्त मानवों के मर्यादा एवं गरिमा को बरकरार
रखते हुए समस्त मुस्लिमों से आह्वान किया है कि “ऐ मुसलमानों ! ये लोग अल्लाह के
अतिरिक्त जिनको पुकारते हैं उन्हें गालियाँ न दो” इस आयत में इनकार करने वाले
(काफिर) को भी सम्मान प्रादान करने का आदेश है | स्पष्ट रूप में मना किया गया है
कि ऐसी बातें जिनमें व्यंग्य का भाव,निन्दा एवं परिहास कि बातें निहित हों तुम्हारे लिए वर्जित हैं |
अगर कोई मुस्लिम या गैर मुस्लिम कुरान मजीद की आयतें या उसका अनुवाद किसी वयक्ति
विशेष,समुदाय,सम्प्रदाय पर निन्दा करने की भावना तथा उसे हीन दर्शाने के लिए
प्रयोग करता है तो उसका ऐसा करना जायज़ नहीं है, क्योंकि कुरान मजीद स्वयं को
किताबे हिदायत(मार्ग दर्शक पुस्तक),किताबे रहमत(दयालु पुस्तक) एवं किताबे नूर
(प्रकाश वाली पुस्तक) कहा है | शब्द काफिर कुरान मजीद का इस्तेलाही शब्द नहीं है, कुरान
ने इस शब्द को हर अवसर पर इनकार के अर्थ में प्रयोग किया है तथा
एकेश्वरवाद,इश्दूतत्व एवं परलोक के बुनयादी उसूलों को न मानने वालों के लिए कभी
शब्द कुफ्र,कभी शिर्क,तो कभी जिर्म का शब्द प्रयोग किया है | कुफ्र और काफिर का शब्द अगर इस्तेलाही होता
तो इसे मुस्लिमों के लिए प्रयोग न किया जाता जिस प्रकार सूरह बक़रह कि आयत दो सौ
छप्पन में अंकित है “ जिस किसी ने बढे हुए फसादी का इनकार करके अल्लाह को
माना,उसने एक ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटने वाला नहीं ” | इस आयत में
शब्द इन्कार (कुफ्र) मुस्लिमों के लिए प्रयोग हुआ है जिसमें कहा जा रहा है की ऐ
इमान वालों शैतान के काफ़िर बन जाओ और एक अल्लाह को मानो जो अजन्मा अलख निरंजन है |
कुरान ने अरब देश कि प्रथम दो समुदायों को “अहले किताब”(आसमानी किताब वाले) एवं
यहूद तथा नसारा (ईसाई) कह कर पुकारा है और ये वो शब्द है जिसको आज भी ये समुदाय
अपने लिए प्रयोग करती है |
मुहम्मद (स०अ०व०) ने काफिर का सम्मान
किया है
हजरत मुहम्मद (स०अ०व०) प्रत्येक मानव को मानवता की निगाह से
देखते थे तथा इसी रिश्ते से समस्त मानव का सम्मान करते थे | हुजूर (स०अ०व०) का एक
वाक्या सहीह बुखारी शरीफ में इस प्रकार है कि “मदीना में एक मर्तबा रसूलुल्लाह
(स०अ०व०) के पास से एक जनाज़ा गुज़रा उस वक्त आप (स०अ०व०) बैठे हुए थे | जनाज़ा को
देख कर उसके सम्मान में हुजुर (स०अ०व०) खड़े हो गए, आप के साथ आपके सहाबा (र०त०अ०)
भी खड़े हो गए | आप (स०अ०व०) से कहा गया कि ये एक यहूदी गैर मुस्लिम का जनाज़ा था
जिसके सम्मान में खड़े होने की आवश्यक्ता नहीं थी | मुहामद (स०अ०व०) ने फरमाया क्या
वो इंसान नहीं था ”(बु०श०,भाग-1,पेज न०-175 ) | मुहम्मद (स०अ०व०) ने उस
गैर-मुस्लिम को गैर-मुस्लिम कि दृष्टि से नहीं अपितु मानवता कि हैसियत से देखा तथा
उसके सम्मान में खड़े हो गए | ये सम्मान मानवता कि एक बहुत बड़ी मिसाल है | ये इस
बात को इंगित करती है कि इस्लाम में किसी गैर-मुस्लिम वयक्ति को नगण्य समझने और
उसे काफिर कह कर चिढाने और उससे नफरत करने की लेस मात्र भी स्थान नहीं है |
हजरत मुहम्मद (स०अ०व०) का पाक इरशाद है “सारा
जीव अल्लाह का कुन्बा है तथा समस्त जीव में अल्लाह को अत्यधिक पसंद वो वयक्ति है
जो उसके कुन्बे से प्रेम करे ” |
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