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मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

भागवत गीता और सुन्नत
 सुन्नत (नीति )
          सुन्नत अरबी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है "नीति"। अल्लाह की नीतियाँ और उनके द्वारा प्रदत्त अवतार या पैगंबर की नीतियों का अनुसरण सुन्नत कहलाता है । कुछ लोग विशेष रूप से सुन्नत का अर्थ "खतना" समझते हैं, जो की गलत है ।  इस्लामिक दृष्टिकोण में सुन्नत का आशय है " दीन-ए-इब्राहिम अलैहिस्सलाम की वो परंपरा, जिसमें पैगंबर मुहम्मद सल्ल॰ ने अल्लाह की आज्ञा के बाद "सुधार कर कुछ नए विचारों के साथ" अपने अनुयायियों में जारी किया ।"

गीतानुसार सुन्नत
                                                यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
                                      स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
                                                                             (गीता-03:21)
भावार्थ
          महापुरुष जो जो आचरण करते हैं, सामान्य व्यक्ति उसी का अनुसरण करते हैं । वह जो कुछ भी प्रमाण छोड़ जाते हैं, सम्पूर्ण विश्व को उसी के अनुकूल अपना आचरण करना चाहिए ।
 तात्पर्य
          सामान्य लोगों को सदैव एक ऐसे नेता की आवश्यकता होती है, जो व्यावहारिक आचरण द्वारा जनता को शिक्षा दे सके । जो इस प्रकार शिक्षा देता है वह आचार्य या आदर्श शिक्षक कहलाता है । अतः शिक्षक को चाहिए की सामान्यजन को शिक्षा देने के लिए स्वयं शास्त्रीय सिद्धान्तों का पालन करे । कोई भी शिक्षक प्राचीन प्रमाणिक ग्रंथों के नियमों के विपरीत कोई नियम नहीं बना सकता । जो व्यक्ति अपनी उन्नति चाहता है उसे महान शिक्षकों द्वारा अभ्यास किये जाने वाले आदर्श नियमों का पालन करना चाहिए ।

          इस प्रकार स्पष्ट है कि "श्रेष्ठ पुरूष- अवतार,ईशदूत,रसूल या पैगंबर" जो-जो आचरण कर गए हैं, अन्य पुरूषों को भी वैसा-वैसा ही आचरण करना चाहिए तथा ये भी ध्यान रहे कि इन आदर्श पुरुषों द्वारा जो भी प्रमाण हमारे लिए छोड़ा गया है हमारा कार्य इसके अनुकूल हो । अरबी भाषा में इसी अनुसरण को सुन्नत कहते हैं ।    

देवताओं के भक्त देवताओं को ही प्राप्त होंगे : भागवत गीता

देवताओं को पूजने वाले देवताओं को ही प्राप्त होंगे : श्रीमदभागवत गीता
हिन्दू धर्म में देवता
            'देव' शब्द में 'तल्' प्रत्यय लगाकर 'देवता' शब्द की व्युत्पत्ति होती है । अत: दोनों में अर्थ-साम्य है । निरूक्तकार ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा, 'जो कुछ देता है वही देवता है' अर्थात देव स्वयं द्युतिमान हैं । कुछ लोग देवता को दिव्य भी कहते हैं जबकि दिव्य का अर्थ भगवान से जुड़ा है । ध्यान रहे देवता सिर्फ उसे नहीं कहते जो दिव्य है, क्योंकि इस अर्थ में तो सभी देवता हैं । सभी कुछ दिव्य है, क्योंकि सभी कुछ दिव्य से निकला है । पत्थर भी दिव्य है, वृक्ष भी दिव्य है, नदी, पहाड़, आकाश सभी दिव्य हैं ।  फिर देवता का यह मतलब नहीं हो सकता कि जो दिव्य है वही देवता है, क्योंकि दिव्य तो सभी हैं । 
फिर विशेष रूप से किसी को देवता कहने का क्या अर्थ है ?
देवता कहने का अर्थ है :- "जो दिव्य की ओर ले जाता है, जो दिव्य की ओर इंगित करता है, जो दिव्य की ओर गति दे देता है वह देवता है । इसलिए हिन्दू समाज में जहांजहां से दिव्यता की ओर इशारा मिला, वह सब देवता हो गए ।
इस्लाम धर्म में फरिश्ता
अरबी भाषा में यही देवता "मलक" कहलाते हैं जिन्हें फारसी एवं उर्दू दोनों भाषा में "फरिश्ता" कहा जाता है । फरिश्तों का अपना शरीर है जो नूर (प्रकाश) से निर्मित है । फरिश्तों को ये अधिकार प्राप्त है कि वो स्वंय को मनुष्य रूप में प्रकट कर सकते हैं । फरिश्ते अति सूक्ष्म भी हो सकते हैं और अति विशाल भी । फरिश्ते पवित्र हैं इनसे कभी पाप हो ही नहीं सकता, ये सदैव अल्लाह की वंदन करते रहते हैं । प्रत्येक मुस्लिम को इन फ़रिश्तों पर ईमान (आस्था) रखना अनिवार्य है ।
देवताओं का उद्देश्य
          देवताओं का उद्देश्य मनुष्यों को लाभ पहुंचाना तथा विकट परिस्थितियों में मनुष्यों की सहायता करना है । शास्त्रों के आलोक में कहा जाए तो हर देवता का अपना एक काम निर्धारित है जिसे सुचारु रूप से देवता और उनके गण अंजाम देते हैं । ऐसे कुछ देवता हैं :  "देवताओं के राजा देवराज इन्द्र, देवऋषि नारद जिनका काम संदेश पहुंचाना है, ब्रह्मा जिनका काम विश्व निर्माण है, विष्णु जिनका काम पालना है, महेश जिनका काम विश्व का संहार है आदि । ये सारे देवता "ब्रह्म" के आदेशानुसार अपने कार्यों में लगे हुए हैं । ठीक इसी प्रकार इस्लाम धर्म में फरिश्तों का स्थान है जिस प्रकार हिन्दू धर्म में देवताओं के राजा देवराज इन्द्र हैं उसी प्रकार इस्लाम धर्म में फरिश्तों के सरदार हजरत जिबराइल अलैहिस्सलाम हैं । हजरत मिकाईल अलैहिस्सलाम जिनका काम पानी बरसाना और प्राणियों तक रोज़ी पहुंचाना है, हजरत इज़राईल अलैहिस्सलाम जो प्राणियों के प्राण निकालते हैं, हजरत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम जो प्रलय पूर्व सूर फूकेंगे और धरती तहस-नहस हो जाएगी आदि । ये सारे फरिश्ते भी अल्लाह ताअला के आदेशानुसार अपने-अपने कार्यों में लगे हुये हैं ।   
गीता और देवताओं की पूजा
निम्नलिखित श्लोकों से ज्ञात होता है कि भगवान उस मनुष्य को पसंद नहीं करते जो उसे छोड़ कर उसके आज्ञाकारी देवताओं कि पूजा करते हैं । भगवान कहते हैं ;

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥
                                      (गीता-07:21)
भावार्थ
          जो-जो भक्त जिस-जिस देवता के रूप को श्रद्धा से पूजने की इच्छा करता है, निश्चय ही मैं उस भक्त की श्रद्धा को उसी देवता के प्रति स्थिर कर देता हूँ ।   

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हितान् ॥
                                      (गीता-07:22)
भावार्थ
          ऐसी श्रद्धा से समन्वित वह भक्त देवता विशेष की पूजा करने का यत्न करता है तथा अपनी इच्छा की पूर्ति करता है । किन्तु वास्तविकता तो यह है कि ये सारे लाभ केवल मेरे द्वारा प्रदत्त हैं ।   

अन्तवत्तुफलंतेषांतद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजोमद्भक्तायान्तिमामपि ॥
                             (गीता-07:23)
भावार्थ
          परंतु उन अल्प बुद्धि वालों का वह फल नाशवान है तथा देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में मुझको ही प्राप्त होते हैं ।

तीनों श्लोक का सारांश
          गीता ने देवताओं के उपासकों को अल्पज्ञ कह कर संबोधित किया है जिसका अर्थ है "कम जानने वाला"। देवतागण परमेश्वर की अनुमति के बिना अपने भक्तों को वर नहीं दे सकते । जीव भले ही यह भूल जाय कि प्रत्येक वस्तु परमेश्वर की सम्पत्ति है, किन्तु देवता इसे नहीं भूलते । अतः देवताओं की पूजा तथा वांछित फल की प्राप्ति देवताओं के कारण नहीं, अपितु उनके माध्यम से भगवान् के कारण होती है । अल्पज्ञानी जीव इसे नहीं जानते, अतः वे मुर्खतावश देवताओं के पास जाते हैं । किन्तु शुद्धभक्त आवश्यकता पड़ने पर परमेश्वर से ही याचना करता है परन्तु वर माँगना शुद्धभक्त का लक्षण नहीं है । जीव सामान्यता देवताओं के पास इसीलिए जाता है, क्योंकि वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए पगलाया रहता है ।

           चैतन्यचरितामृत में कहा गया है कि जो व्यक्ति परमेश्वर की पूजा के साथ-साथ भौतिकभोग की कामना करता है वह परस्पर विरोधी इच्छाओं वाला होता है । परमेश्वर की भक्ति तथा देवताओं की पूजा समान स्तर पर नहीं हो सकती, क्योंकि देवताओं की पूजा भौतिक है और परमेश्वर की भक्ति नितान्त आध्यात्मिक है । अतः गीतानुसार हमें देवताओं की पूजा से ऊपर उठ कर परमेश्वर की पूजा करनी चाहिए ।

रविवार, 9 अप्रैल 2017

इस्लाम कट्टरता नहीं उदारता सिखाता है

इस्लाम कट्टरता नहीं उदारता सिखाता है
कोई माने या नहीं, परंतु आज भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में इस्लाम एक बहस का मुद्दा है । मेरी दृष्टि में मुख्यतः बहस के दो कारण हैं  जिसमें पहला कारण दीन से कोसों दूर रहने वाले मुसलमानों द्वारा इस्लाम के नाम पर अपनाया गया कट्टरता व हिसंक व्यवहार है, तो दूसरा किसी नवबौद्धिक प्रबुद्ध द्वारा कुरआन और हदीस के किसी भी प्रकरण को संदर्भ से नहीं समझ पाना है । जबकि इस्लाम अपने मूल सिद्धान्तों में केवल उदारता और शांति का ही पक्ष रखता है । इस्लाम में क्रोध,कट्टरता,असहिष्णुता तथा हिंसक व्यवहार हराम है । यहाँ तक के वो युद्ध का मैदान ही क्यों न हो, मैदाने उहद में घायल होने के बावजूद मुहम्मद सल्ल॰ ने अपने शत्रुओं को दुआ दी है । हदीस में वर्णित है " हजरत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि॰ कहते हैं कि मुहम्मद सल्ल॰ का शुभ चेहरा मेरी आँखों के समक्ष है । आप सल्ल॰ किसी पैगम्बर की घटना का वर्णन कर रहे थे (जो स्वयं इनकी अपनी घटना थी) कि उसकी क़ौम ने उसे घायल कर दिया और पैगंबर अपने चेहरे से खून साफ करता जा रहा था और दुआ मांग रहा था "ऐ हमारे पालनहार ! मेरी क़ौम को क्षमा कर दे,वह जानते नहीं" (मुस्लिम) ।" ऐसे ही कई उदाहरण है जो मुहम्मद सल्ल॰ के जीवन काल में घटित हुई हैं,जो इस बात को इंगित करती है के इस्लाम कट्टरता नहीं उदारता सिखाता है ।
जिसका व्यवहार सुंदर होगा,वही उत्तम ईमान वाला होगा
          ईमान अरबी भाषा का शब्द है, जिसका स्त्रोत 'अलिफ,मीम और नून' अर्थात अमन है । शब्दकोश की दृष्टि से ईमान का अर्थ अमन (शांति),अमानत और विश्वास है, शरई अर्थ दिल से विश्वास, ज़ुबान से कहना और शारीरिक तौर से अमल का नाम ईमान है । मुसलमानों के निकट ईमान से बढ़ कर कोई कीमती दौलत नहीं है, अगर ईमान की दौलत उसके पास से निकल जाये तो वह व्यक्ति मुसलमान नहीं हो सकता । मुहम्मद सल्ल॰ ने इस अनमोल ईमान की तुलना अखलाक हुस्ना (सुंदर व्यवहार) से की है, अर्थात जिस मुसलमान का आचरण या व्यवहार सही नहीं है वह ईमान वाला नहीं हो सकता । इससे ज्ञात हुआ की ईमान वाला होने के लिए सर्वप्रथम उसके व्यवहार में सुंदरता अनिवार्य है । मुहम्मद सल्ल॰ का कथन है "जिस व्यक्ति का व्यवहार सुंदर होगा, समस्त मोमिनो (मुसलमानों) में उसका ईमान उत्तम होगा " । अल्लाह से प्रेम भावना में हो सकता है किसी व्यक्ति को इबादत के आधिक्य का अहंकार हो जाए और उसके निकट सुंदर व्यवहार महत्वहीन हो जाए इससे बचने के लिए मुहम्मद सल्ल॰ ने चेतावनी दी है :- " व्यक्ति अपने व्यवहार के बदौलत उस स्थान तक पहुँच जाता है,जो रात भर खड़े हो कर नमाज़ पढ़ने वाले और उम्र भर रोज़ा रखने वाले को प्राप्त होता है " ।
मुहम्मद बिन कासिम ने मंदिर में पूजा करने कि अनुमति दी
          भारत में मुस्लिम राज का आरंभ मुहम्मद बिन कासिम से माना जाता है । मुहम्मद बिन कासिम उमय्यद खिलाफत का एक सत्रह वर्षीय नवयुवक सिपहसालार था, जिसकी बागडोर हज्जाज बिन युसुफ के हाथों में थी । चचनामा में वर्णित है "मुहम्मद बिन कासिम ब्राह्मणों से प्रेम करता था क्योंकि वह जानता था कि ब्राह्मण ईमानदार होते हैं । इस हेतु उन्हें उच्च पदों पर नियुक्त किया, उसने ब्राह्मणों को ये कह कर पद प्रदान किया कि ये पद पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतर आपके वंश को मिलते रहेंगे । इसका एक बड़ा लाभ ये हुआ कि ब्राह्मणों ने मुहम्मद बिन कासिम की एक अच्छी छवि आम हिन्दू जनता के दिल में बना दी, जिसके परिणामस्वरूप किसानों ने स्वयं खेराज (कर) देना स्वीकार्य कर लिया (चचनामा :210-11)।"
          ब्रह्म्णाबाद (वर्तमान नाम मंसूरा) में एक बहुत बड़ा मंदिर था । आक्रमण और युद्ध के कारण इस मंदिर में लोगों का आना-जाना बंद हो गया था, जिस कारण मंदिर की आमदनी समाप्त हो गई और पुरोहितों का आमरण उपवास हो गया । एक दिन मंदिर के पुरोहित मुहम्मद बिन कासिम के पास उपस्थित हुए और मंदिर के जीर्णोद्धार की बात कही और साथ ये भी निवेदन किया की आप हिन्दू जानता को ये आदेश दें की वह मंदिर जा कर अपने ईष्ट की पूजा करें । तब मुहम्मद बिन कासिम ने उत्तर दिया आपका मंदिर मेरे क़ब्ज़े में नहीं है । तब सारी हिन्दू जानता मुहम्मद बिन कासिम से कहने लगी : ये हमारे पुरोहित हैं,हमारी शादी-विवाह,मरनी-जीनी में ये ही तो आते हैं अतः आप मंदिर के जीर्णोद्धार एवं वहाँ जा कर पूजा करने की अनुमति प्रदान करें । मुहम्मद बिन कासिम ने ये सारी घटना हज्जाज बिन युसुफ को पत्र लिख कर बताया,तब हज्जाज बिन युसुफ का जो उत्तर आया वो द्रष्टव्य हो ;
          "हालात ज्ञात हुआ ! अगर ब्रह्म्णाबाद के मोकद्दम (मोकद्दमा करने वाले) अपना मंदिर बनाना चाहते हैं तो अब जबकि उन्होने हमारी आज्ञाकारिता स्वीकार करली है और दारुलखेलाफत (राजकीय कोष) में कर भुगतान का दायित्व उठा लिया है तो इस कर के अतिरिक्त हमें कुछ नहीं चाहिए । जब वो हमारे शरणार्थी हो चुके हैं तो उनके जान और माल में किसी प्रकार का भेद भाव उचित नहीं । उनको आज्ञा दी जाए कि वो अपने ईष्ट की उपासना करें । धर्म के अनुसरण कि स्वतन्त्रता न छीनी जाए ताकि वो अपने घर में जिस तरह चाहें रहें । ये उनका पूरा अधिकार है (इस्लामी रवादरी: पृष्ट-91-92)।" 

हम सब स्वयंभू मनु और शतरूपा की संतान हैं