Powered By Blogger

रविवार, 9 अप्रैल 2017

इस्लाम कट्टरता नहीं उदारता सिखाता है

इस्लाम कट्टरता नहीं उदारता सिखाता है
कोई माने या नहीं, परंतु आज भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में इस्लाम एक बहस का मुद्दा है । मेरी दृष्टि में मुख्यतः बहस के दो कारण हैं  जिसमें पहला कारण दीन से कोसों दूर रहने वाले मुसलमानों द्वारा इस्लाम के नाम पर अपनाया गया कट्टरता व हिसंक व्यवहार है, तो दूसरा किसी नवबौद्धिक प्रबुद्ध द्वारा कुरआन और हदीस के किसी भी प्रकरण को संदर्भ से नहीं समझ पाना है । जबकि इस्लाम अपने मूल सिद्धान्तों में केवल उदारता और शांति का ही पक्ष रखता है । इस्लाम में क्रोध,कट्टरता,असहिष्णुता तथा हिंसक व्यवहार हराम है । यहाँ तक के वो युद्ध का मैदान ही क्यों न हो, मैदाने उहद में घायल होने के बावजूद मुहम्मद सल्ल॰ ने अपने शत्रुओं को दुआ दी है । हदीस में वर्णित है " हजरत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रजि॰ कहते हैं कि मुहम्मद सल्ल॰ का शुभ चेहरा मेरी आँखों के समक्ष है । आप सल्ल॰ किसी पैगम्बर की घटना का वर्णन कर रहे थे (जो स्वयं इनकी अपनी घटना थी) कि उसकी क़ौम ने उसे घायल कर दिया और पैगंबर अपने चेहरे से खून साफ करता जा रहा था और दुआ मांग रहा था "ऐ हमारे पालनहार ! मेरी क़ौम को क्षमा कर दे,वह जानते नहीं" (मुस्लिम) ।" ऐसे ही कई उदाहरण है जो मुहम्मद सल्ल॰ के जीवन काल में घटित हुई हैं,जो इस बात को इंगित करती है के इस्लाम कट्टरता नहीं उदारता सिखाता है ।
जिसका व्यवहार सुंदर होगा,वही उत्तम ईमान वाला होगा
          ईमान अरबी भाषा का शब्द है, जिसका स्त्रोत 'अलिफ,मीम और नून' अर्थात अमन है । शब्दकोश की दृष्टि से ईमान का अर्थ अमन (शांति),अमानत और विश्वास है, शरई अर्थ दिल से विश्वास, ज़ुबान से कहना और शारीरिक तौर से अमल का नाम ईमान है । मुसलमानों के निकट ईमान से बढ़ कर कोई कीमती दौलत नहीं है, अगर ईमान की दौलत उसके पास से निकल जाये तो वह व्यक्ति मुसलमान नहीं हो सकता । मुहम्मद सल्ल॰ ने इस अनमोल ईमान की तुलना अखलाक हुस्ना (सुंदर व्यवहार) से की है, अर्थात जिस मुसलमान का आचरण या व्यवहार सही नहीं है वह ईमान वाला नहीं हो सकता । इससे ज्ञात हुआ की ईमान वाला होने के लिए सर्वप्रथम उसके व्यवहार में सुंदरता अनिवार्य है । मुहम्मद सल्ल॰ का कथन है "जिस व्यक्ति का व्यवहार सुंदर होगा, समस्त मोमिनो (मुसलमानों) में उसका ईमान उत्तम होगा " । अल्लाह से प्रेम भावना में हो सकता है किसी व्यक्ति को इबादत के आधिक्य का अहंकार हो जाए और उसके निकट सुंदर व्यवहार महत्वहीन हो जाए इससे बचने के लिए मुहम्मद सल्ल॰ ने चेतावनी दी है :- " व्यक्ति अपने व्यवहार के बदौलत उस स्थान तक पहुँच जाता है,जो रात भर खड़े हो कर नमाज़ पढ़ने वाले और उम्र भर रोज़ा रखने वाले को प्राप्त होता है " ।
मुहम्मद बिन कासिम ने मंदिर में पूजा करने कि अनुमति दी
          भारत में मुस्लिम राज का आरंभ मुहम्मद बिन कासिम से माना जाता है । मुहम्मद बिन कासिम उमय्यद खिलाफत का एक सत्रह वर्षीय नवयुवक सिपहसालार था, जिसकी बागडोर हज्जाज बिन युसुफ के हाथों में थी । चचनामा में वर्णित है "मुहम्मद बिन कासिम ब्राह्मणों से प्रेम करता था क्योंकि वह जानता था कि ब्राह्मण ईमानदार होते हैं । इस हेतु उन्हें उच्च पदों पर नियुक्त किया, उसने ब्राह्मणों को ये कह कर पद प्रदान किया कि ये पद पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतर आपके वंश को मिलते रहेंगे । इसका एक बड़ा लाभ ये हुआ कि ब्राह्मणों ने मुहम्मद बिन कासिम की एक अच्छी छवि आम हिन्दू जनता के दिल में बना दी, जिसके परिणामस्वरूप किसानों ने स्वयं खेराज (कर) देना स्वीकार्य कर लिया (चचनामा :210-11)।"
          ब्रह्म्णाबाद (वर्तमान नाम मंसूरा) में एक बहुत बड़ा मंदिर था । आक्रमण और युद्ध के कारण इस मंदिर में लोगों का आना-जाना बंद हो गया था, जिस कारण मंदिर की आमदनी समाप्त हो गई और पुरोहितों का आमरण उपवास हो गया । एक दिन मंदिर के पुरोहित मुहम्मद बिन कासिम के पास उपस्थित हुए और मंदिर के जीर्णोद्धार की बात कही और साथ ये भी निवेदन किया की आप हिन्दू जानता को ये आदेश दें की वह मंदिर जा कर अपने ईष्ट की पूजा करें । तब मुहम्मद बिन कासिम ने उत्तर दिया आपका मंदिर मेरे क़ब्ज़े में नहीं है । तब सारी हिन्दू जानता मुहम्मद बिन कासिम से कहने लगी : ये हमारे पुरोहित हैं,हमारी शादी-विवाह,मरनी-जीनी में ये ही तो आते हैं अतः आप मंदिर के जीर्णोद्धार एवं वहाँ जा कर पूजा करने की अनुमति प्रदान करें । मुहम्मद बिन कासिम ने ये सारी घटना हज्जाज बिन युसुफ को पत्र लिख कर बताया,तब हज्जाज बिन युसुफ का जो उत्तर आया वो द्रष्टव्य हो ;
          "हालात ज्ञात हुआ ! अगर ब्रह्म्णाबाद के मोकद्दम (मोकद्दमा करने वाले) अपना मंदिर बनाना चाहते हैं तो अब जबकि उन्होने हमारी आज्ञाकारिता स्वीकार करली है और दारुलखेलाफत (राजकीय कोष) में कर भुगतान का दायित्व उठा लिया है तो इस कर के अतिरिक्त हमें कुछ नहीं चाहिए । जब वो हमारे शरणार्थी हो चुके हैं तो उनके जान और माल में किसी प्रकार का भेद भाव उचित नहीं । उनको आज्ञा दी जाए कि वो अपने ईष्ट की उपासना करें । धर्म के अनुसरण कि स्वतन्त्रता न छीनी जाए ताकि वो अपने घर में जिस तरह चाहें रहें । ये उनका पूरा अधिकार है (इस्लामी रवादरी: पृष्ट-91-92)।" 

हम सब स्वयंभू मनु और शतरूपा की संतान हैं