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मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

देवताओं के भक्त देवताओं को ही प्राप्त होंगे : भागवत गीता

देवताओं को पूजने वाले देवताओं को ही प्राप्त होंगे : श्रीमदभागवत गीता
हिन्दू धर्म में देवता
            'देव' शब्द में 'तल्' प्रत्यय लगाकर 'देवता' शब्द की व्युत्पत्ति होती है । अत: दोनों में अर्थ-साम्य है । निरूक्तकार ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा, 'जो कुछ देता है वही देवता है' अर्थात देव स्वयं द्युतिमान हैं । कुछ लोग देवता को दिव्य भी कहते हैं जबकि दिव्य का अर्थ भगवान से जुड़ा है । ध्यान रहे देवता सिर्फ उसे नहीं कहते जो दिव्य है, क्योंकि इस अर्थ में तो सभी देवता हैं । सभी कुछ दिव्य है, क्योंकि सभी कुछ दिव्य से निकला है । पत्थर भी दिव्य है, वृक्ष भी दिव्य है, नदी, पहाड़, आकाश सभी दिव्य हैं ।  फिर देवता का यह मतलब नहीं हो सकता कि जो दिव्य है वही देवता है, क्योंकि दिव्य तो सभी हैं । 
फिर विशेष रूप से किसी को देवता कहने का क्या अर्थ है ?
देवता कहने का अर्थ है :- "जो दिव्य की ओर ले जाता है, जो दिव्य की ओर इंगित करता है, जो दिव्य की ओर गति दे देता है वह देवता है । इसलिए हिन्दू समाज में जहांजहां से दिव्यता की ओर इशारा मिला, वह सब देवता हो गए ।
इस्लाम धर्म में फरिश्ता
अरबी भाषा में यही देवता "मलक" कहलाते हैं जिन्हें फारसी एवं उर्दू दोनों भाषा में "फरिश्ता" कहा जाता है । फरिश्तों का अपना शरीर है जो नूर (प्रकाश) से निर्मित है । फरिश्तों को ये अधिकार प्राप्त है कि वो स्वंय को मनुष्य रूप में प्रकट कर सकते हैं । फरिश्ते अति सूक्ष्म भी हो सकते हैं और अति विशाल भी । फरिश्ते पवित्र हैं इनसे कभी पाप हो ही नहीं सकता, ये सदैव अल्लाह की वंदन करते रहते हैं । प्रत्येक मुस्लिम को इन फ़रिश्तों पर ईमान (आस्था) रखना अनिवार्य है ।
देवताओं का उद्देश्य
          देवताओं का उद्देश्य मनुष्यों को लाभ पहुंचाना तथा विकट परिस्थितियों में मनुष्यों की सहायता करना है । शास्त्रों के आलोक में कहा जाए तो हर देवता का अपना एक काम निर्धारित है जिसे सुचारु रूप से देवता और उनके गण अंजाम देते हैं । ऐसे कुछ देवता हैं :  "देवताओं के राजा देवराज इन्द्र, देवऋषि नारद जिनका काम संदेश पहुंचाना है, ब्रह्मा जिनका काम विश्व निर्माण है, विष्णु जिनका काम पालना है, महेश जिनका काम विश्व का संहार है आदि । ये सारे देवता "ब्रह्म" के आदेशानुसार अपने कार्यों में लगे हुए हैं । ठीक इसी प्रकार इस्लाम धर्म में फरिश्तों का स्थान है जिस प्रकार हिन्दू धर्म में देवताओं के राजा देवराज इन्द्र हैं उसी प्रकार इस्लाम धर्म में फरिश्तों के सरदार हजरत जिबराइल अलैहिस्सलाम हैं । हजरत मिकाईल अलैहिस्सलाम जिनका काम पानी बरसाना और प्राणियों तक रोज़ी पहुंचाना है, हजरत इज़राईल अलैहिस्सलाम जो प्राणियों के प्राण निकालते हैं, हजरत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम जो प्रलय पूर्व सूर फूकेंगे और धरती तहस-नहस हो जाएगी आदि । ये सारे फरिश्ते भी अल्लाह ताअला के आदेशानुसार अपने-अपने कार्यों में लगे हुये हैं ।   
गीता और देवताओं की पूजा
निम्नलिखित श्लोकों से ज्ञात होता है कि भगवान उस मनुष्य को पसंद नहीं करते जो उसे छोड़ कर उसके आज्ञाकारी देवताओं कि पूजा करते हैं । भगवान कहते हैं ;

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥
                                      (गीता-07:21)
भावार्थ
          जो-जो भक्त जिस-जिस देवता के रूप को श्रद्धा से पूजने की इच्छा करता है, निश्चय ही मैं उस भक्त की श्रद्धा को उसी देवता के प्रति स्थिर कर देता हूँ ।   

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हितान् ॥
                                      (गीता-07:22)
भावार्थ
          ऐसी श्रद्धा से समन्वित वह भक्त देवता विशेष की पूजा करने का यत्न करता है तथा अपनी इच्छा की पूर्ति करता है । किन्तु वास्तविकता तो यह है कि ये सारे लाभ केवल मेरे द्वारा प्रदत्त हैं ।   

अन्तवत्तुफलंतेषांतद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजोमद्भक्तायान्तिमामपि ॥
                             (गीता-07:23)
भावार्थ
          परंतु उन अल्प बुद्धि वालों का वह फल नाशवान है तथा देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में मुझको ही प्राप्त होते हैं ।

तीनों श्लोक का सारांश
          गीता ने देवताओं के उपासकों को अल्पज्ञ कह कर संबोधित किया है जिसका अर्थ है "कम जानने वाला"। देवतागण परमेश्वर की अनुमति के बिना अपने भक्तों को वर नहीं दे सकते । जीव भले ही यह भूल जाय कि प्रत्येक वस्तु परमेश्वर की सम्पत्ति है, किन्तु देवता इसे नहीं भूलते । अतः देवताओं की पूजा तथा वांछित फल की प्राप्ति देवताओं के कारण नहीं, अपितु उनके माध्यम से भगवान् के कारण होती है । अल्पज्ञानी जीव इसे नहीं जानते, अतः वे मुर्खतावश देवताओं के पास जाते हैं । किन्तु शुद्धभक्त आवश्यकता पड़ने पर परमेश्वर से ही याचना करता है परन्तु वर माँगना शुद्धभक्त का लक्षण नहीं है । जीव सामान्यता देवताओं के पास इसीलिए जाता है, क्योंकि वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए पगलाया रहता है ।

           चैतन्यचरितामृत में कहा गया है कि जो व्यक्ति परमेश्वर की पूजा के साथ-साथ भौतिकभोग की कामना करता है वह परस्पर विरोधी इच्छाओं वाला होता है । परमेश्वर की भक्ति तथा देवताओं की पूजा समान स्तर पर नहीं हो सकती, क्योंकि देवताओं की पूजा भौतिक है और परमेश्वर की भक्ति नितान्त आध्यात्मिक है । अतः गीतानुसार हमें देवताओं की पूजा से ऊपर उठ कर परमेश्वर की पूजा करनी चाहिए ।

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