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शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

पवित्र क़ुरआन तो मानव जाती की पुस्तक है |

 जिस प्रकार प्रकृती और उसकी समस्त वस्तुएं सबके लिए समान होती है वैसे ही धर्म तथा इसकी शुभ शिक्षाएं सबके लिए समान होती है | धर्म एक ऐसी रस्सी है जो समस्त मानवों को ईश-भय से बाँधती है शायद इसलिए मनुष्य ईश-भय कि इस पवित्र रस्सी से स्वयं को बाँधता हुआ इस धरती पर एक सभ्य तथा भद्र समाज का निर्माण करता है | एक सभ्य समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए विधि-वयवस्था कि आवश्यकता पड़ती है जिसके दम पर मानव इस खुले आकाश के नीचे अपने पूर्ण अधिकारों के साथ स्वतंत्र एवं शांत रहता है | परन्तु अगर कोई मानव को उसके इस अधिकार से वंचित कर दे तो ऐसा करना मेरी दृष्टिकोण में उस मानव तथा उसके समाज पर अत्यचार है | इसी सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि क्या हिन्दुओं का इश्वर,मुसलमानों का खुदा, ईसाईयों का गॉड इत्यादि सब अलग-अलग सत्ता है या एक ही सत्ता है जिसे अलग अलग नामों से जाना और पुकारा जाता है जब सत्ता एक है तो उसका सन्देश भी एक ही होगा चाहे लोग कुछ भी कहते रहें | धर्म की पवित्र पुस्तकें उसी धर्म विशेष के मानने वालों के लिए होती है या समस्त मानव तथा मानव समाज के कल्याण के लिए होती है ? रमजान के इस पावन बेला में आज जिस विषय पर चर्चा है वह ये है कि क्या पवित्र कुरआन मजीद केवल मुसलमानों कि पुस्तक है या गैरमुस्लिमों कि इस पर चर्चा इसलिए ज़रूरी है कि बहुत सारे मुस्लिम को ग़लतफ़हमी है कि क़ुरआन गैरमुस्लिमों को नहीं देना चाहिए |
ऐसे नाज़िल हुआ क़ुरआन
 सऊदी अरब के मक्का शहर के निकट एक पहाड़ के गुफा में जिसका नाम गारे हिरा है अल्लाह के देवदूत हजरत जिब्राइल द्वारा मुहम्मद सल्ल० को सन 610 ई०में पहली बार मौखिक क़ुरआन सुनाया गया | क़ुरआन का अवतरण आवश्यकतानुसार होता था इसलिए पूरा क़ुरआन 23 वर्षों कि लम्बी अवधि में नाज़िल हुआ अर्थात 632 ई० में मुहम्मद सल्ल०के मृत्यु से पूर्व पूर्ण हुआ | क़ुरआन में कुल 114 अध्याय हैं जिन्हें सूरह कहते हैं | हर अध्याय में कुछ मंत्र हैं जिन्हें आयत कहते हैं | मुहम्मद सल्ल० के मृत्यु के बाद सन 633 ई० में इसे पहली बार लिखा गया | तीसरे खलीफ़ा हजरत उस्मान रज़ि० ने अपने सत्ता समय में हजरत सिद्दिके अकबर द्वारा संकलित क़ुरआन मजीद की नौ प्रतियाँ तैयार करके कई देशों में भेजा था उनमें से दो क़ुरआन कि प्रतियाँ आज भी सुरक्षित हैं एक ताशकंद में तथा दूसरा तुर्की में | किसी भी भू-भाग से क़ुरआन लीजिये और उसे इन प्राचीन युग कि प्रतियों से मिलाइये स्पष्ट हो जाता है कि इस धरती पर उपस्थित प्रत्येक क़ुरआन की प्रति वही मूल प्रति का प्रतिरूप है जो मुहम्मद सल्ल० पर अवतरित हुई थी | क़ुरआन पर आस्थावान का छः हक़ है - १. ईमान (आस्था) -2:165,२. तिलावत (पाठ) – 2:121, ३. समाअ (सुनना) – 7:204, ४. गौर-फ़िक्र– 47:24, ५. अमल – 25:30, ६. तब्लीग (प्रसार) – 5:67 |
क़ुरआन सबका है
धर्म को लेकर मानवों ने सदैव ये भ्रान्ति बनाई कि जो जिस धर्म का है उसे केवल उसी धर्म कि पावन पुस्तक का पाठ करना चाहिए ,उस धर्म के प्रवर्तकों महान आत्माओं का हीं केवल आदर करना चाहिए  तथा उसे केवल अपने धर्म स्थलों में ही जाना चाहिए | मानवों के इस विधि-वयवस्था ने मानवों के बीच नफरत कि एक ऐसी लकीर खींच दी जिसका उलंघन रक्त कि नदियों में बदल गया और धर्म नफरत के इस बदबूदार रक्त में डूब गया | जबकि धर्म ने सदैव आवाज़ लगायी कि तुम सब एक माता-पिता कि संतान हो तुम सब आपस में भाई- भाई हो परन्तु हमारा अहंकार और झूठी शान ने हमें अपने परमेश्वर के सामने मुजरिम बना कर जवाबदेही हेतु खड़ा कर दिया है बहरहाल बात क़ुरआन कि हो रही है क़ुरआन ने इस भ्रान्ति को समाप्त करने हेतु उपाय सुझाते हुए कहा है “ ऐ नबी ! कहो हम परमेश्वर को मानते हैं,उस शिक्षा को मानते हैं जो हम पर उतारी गई है,उन शिक्षाओं को भी मानते हैं जो इब्राहीम, इस्माइल, इसहाक़, याक़ूब और याक़ूब की संतान पर उतरी थीं और उन आदेशों को भी मानते हैं जो मूसा और ईसा और दूसरे पैगम्बरों को उनके रब कि ओर से दिए गए,हम उनके बीच अंतर नहीं करते और हम परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं ” (03:84) | पुरे क़ुरआन में ये कहीं वर्णित नहीं है कि क़ुरआन केवल मुसलमानों कि पुस्तक है अपितु क़ुरआन में वर्णित है “ऐ नबी ! हमने सारे इंसानों के लिए यह किताब हक के साथ तुम पर उतार दी है”(क़ुरआन-39:41) | इसी प्रकार क़ुरआन में एक जगह और वर्णित है “रमजान वह महीना है जिसमें क़ुरआन उतारा गया जो इंसानों के लिएसर्वथा मार्गदर्शन है और ऐसी अस्पष्ट शिक्षाओं पर आधारित है,जो सीधा मार्ग दिखाने वाली और सत्य असत्य का अंतर खोल कर रख देने वाली है”(क़ुरआन-02:185) |


       

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