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गुरुवार, 2 जुलाई 2015

आतंकवाद घिनौना अपराध

       आतंकवाद मानवता के सीने में घुसा हुआ ऐसा अस्त्र है जो न तो सुकून से जीने ही देता है और ना ही सुकून से मरने | बहुत से मुसलमान ऐसे हैं जो इस्लामिक शिक्षाओं से अवगत नही हैं इसी इस्लामिक शिक्षा-हीनता के कारण हीं बहुत से मुस्लिम नौजवान इस तथ्य से बहका लिए जाते हैं कि अल्लाह के लिए उसके दीन के लिए और उसके आखरी नबी सल्ल० के लिए स्वयं को मिटा दो,इस राह में स्वर्ग का वास्तविक अधिकारी वो है जो समस्त कठिनाइयों को सहते हुए स्वयं के शरीर का त्याग कर दे तो उसका ये त्याग असफल नही होगा अपितु वह शहादत का दर्जा पायेगा अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० के निकट शहीद कहलायेगा | इस शहादत और स्वर्ग कि कामना में वो नौजवान स्वयं को आतंकवाद के हाँथो बेच डालता है और आरम्भ हो जाती है रक्त रंजित खेल,उपद्रव एवं भय फैलाने कि नीति | प्रत्येक आतंकवादी घटनाओं के तुरंत बाद उस घटना पर इस्लाम नाम कि चादर ओढ़ा दी जाती है और कह दिया जाता है कि इस्लाम का अल्लाह,उसका कुरआन,उसका नबी सल्ल०क्रूर एवं निर्दयी है | इस्लाम के आवरण में सुसज्जित ढोंगी राजनीतिज्ञ एवं ढोंगी धर्म गुरु होते हैं जो इस्लाम को बजाहिर क्रूरता के द्वार पर ला खड़ा करते हैं और हम मुसलमान उसे मूक दर्शक बन कर देखते रहते हैं इस तथ्य से हर मुस्लिम भीज्ञ है कि इस्लाम मानवता कि सुरक्षा के लिए आया है परन्तु आज मुसलमान के गलतियों के कारण इस्लाम को मानवता का शत्रु कहा जाता है | कुरआन सुरह अशशूरा आयत सैंतीस से तेंतालीस तक में मुसलमानों को शिक्षा इस प्रकार दी गयी है- जो बड़े-बड़े गुनाहों और अशलील कर्मों से बचते हैं और अगर गुस्सा आजाये तो माफ़ कर देते हैं, जो अपने रब का आदेश मानते हैं,नमाज़ कायम करते हैं,अपने मामले आपस के परामर्श से चलाते हैं,हमने जो कुछ भी रोज़ी उन्हें दी है उसमे से खर्च करते हैं और जब उनपर ज्यादती की जाती है तो उसका मुकाबला करते हैं,बुराई का बदला वैसे ही बुराई है,फिर जो कोई माफ़ करदे और सुधार करे उसका बदला अल्लाह के जिम्मे है, अल्लाह जालिमों को पसंद नहीं करता और जो लोग ज़ुल्म होने के बाद बदला ले तो उनकी निंदा नही कि जा सकती,नींदनीये तो वे है जो दूसरों पर ज़ुल्म करते हैं और धरती में नाहक ज्यादती करते हैं | ऐसे लोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब है | अलबत्ता जो व्यक्ति सब्र से काम ले और माफ़ करे,तो वह बड़े साहस पूर्ण कामों में से है | महान है अल्लाह ! इस आयत से धार्मिक उदारता का श्रोत प्रवाहित हो रहा है, लेकिन क्या हम उस पवित्र आदेश पर विश्वास रखते हैं ? नहीं नहीं ! हम तो बात-बात पर क्रोधित हो जाते हैं | शायद किसी को ख़याल हो कि व्यक्तिगत दुर्व्यवहार या कष्ट सहा जा सकता है, किन्तु यदि धर्म पर आक्रमण हो तो उसे सहन नहीं किया जा सकता,तो मैं ऐसे भाइयों कि इस धार्मिक भावना पर कुर्बान जाऊँ | किन्तु एक बात मेरी समझ में नहीं आता कि किसी धर्म के अनुयायी के लिए उसी धर्म के आदेशों के विरुद्ध काम करना कहाँ तक धर्म का पालन या धर्म का सम्मान कहा जा सकता है ?आप के समक्ष है हाल ही में घटित घटना चार्ली एब्दो कि जिसका जुर्म सिर्फ इतना था कि इसने महान मुहम्मद सल्ल०का कार्टून बनाया था ये लोग इस बात से अवगत नहीं कि जिस नबी सल्ल० का कार्टून बनाया गया वो उसके भी नबी थे सुरह अल आराफ आयत एकसौ अंठावन में वर्णित है –" ऐ मुहम्मद सल्ल०! कहो ऐ इंसानों मैं तुम सब कि ओर उस अल्लाह का पैगम्बर हूँ " स्पष्ट है कि जितना अधिकार एक मुसलमान का मुहम्मद सल्ल० पर है उतना ही अधिकार समस्त इंसानों का भी है विशेष रूप से उन कार्टूनिष्टो का भी जिनकी निर्मम हत्या के उपरान्त उनके शवों पर ये आवाज़ गुंजायमान की गयी “ हमने अपने नबी के अपमान का बदला ले लिया है ” ऐ मेरे भाई अल्लाह ने इस्लाम के सच्चे अनुयायी को अधिक नम्रता,सहनशीलता और उच्च आदर्शिता से काम लेने का आदेश दिया है सुरह अल मोमिनून आयत छियानवे में आदेश है- "यदि कोई तुम्हारे साथ बुराई करे तो बुराई को ऐसे व्यवहार से मिटाओ जो बहुत ही अच्छा हो | ऐ पैगम्बर जो कुछ वे तुम्हारे बारे में कहते हैं,वह हमको भली भांति मालूम है |" एक और आदेश देखिये सुरह अल क़सस आयत चउव्वन में है- "बुराई को भलाई से दूर करो |" कितनी पवित्र और कितनी उत्तम शिक्षा है प्रायः गैर मुस्लिम भाई , बल्कि मुस्लिम भाई भी यह समझते हैं कि इस्लाम में बुराई के बदले भलाई करने का कहीं आदेश नहीं वो भाई इस आदेश को आँखें खोल कर देखें और अपनी अज्ञानता को दूर करें |   मैं समझता हूँ आज के सांप्रदायिक दंगे,निर्दोष व्यक्तियों कि हत्या पवित्र कुरआन की शिक्षा से उदासीनता दिखाने का परिणाम है | यदि इश्वरिये आदेश को सदा सामने रखा जाए तो यह अत्याचार,दंगे,उपद्रव,खून-खराबा पूरी तरह समाप्त हो सकते हैं|

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