Powered By Blogger

बुधवार, 1 जुलाई 2015

इस्लाम कि दृष्टि में काफ़िर

इस्लाम कि दृष्टि में काफ़िर
एक भाई ने कहा के मुसलमान अपने सिवा दूसरों को नगण्य समझता है तथा उनसे घृणा करते है और इसका कारण इस्लाम की शिक्षाएं है | कुरआन मजीद के अनुकूल मुसलमानों के अतिरिक्त जितने भी लोग है वह सब के सब ‘ काफ़िर ’ है | मुसलमान उनको काफ़िर कहते है | इस प्रकार के विचार का परिणाम तो यही हो सकता है के मुसलमानों के दिलो में दुसरो के प्रति नफरत और नगण्यता का भाव जन्म ले ?
मैंने उस भाई से कहा वास्तविकता तो ये है भाई की गलत ढंग से इस प्रकार की भ्रान्ति इस्लाम और मुसलमानों से लोगो को दूर रखने के लिए फैलायी जाती है | इस्लामी शिक्षाएं तथा मुसलमानों को इस प्रकार की फिजूल बातो से कोई संबंध नहीं है |
इस्लामिक दृष्टिकोण
इस सिलसिले में इस्लाम की बुनियादी तथ्य ये है की मुसलमानों के अतिरिक्त दूसरी समस्त जातियाँ एवं सम्प्रदाय इंसानी रिश्ते से आपस में भाई है तथा सब लोग इस्लाम को जानने हेतु आमंत्रित है | कुरआन का आदेश है कि  “ अपने रब के मार्ग की ओर तत्वदर्शिता और सदुपदेश के साथ बुलाओ और उनसे ऐसे ढंग से वाद–विवाद करो जो उत्तम है ” (नहल - 125) |  अगर आमंत्रित व्यक्ति के साथ हमदर्दी की जगह नगण्यता का व्यवहार किया जाए तो  इस्लाम का पैगाम उन तक नहीं पहुंचाया जा सकता है | फिर किसी मुसलमान के लिए उनकी गुंजाईश कैसे निकल सकती है की वो अपने सिवा हिन्दू को नगण्य जाने ऐसी परिस्थिति में तो वो इस्लाम के आमन्त्रण की बुनियाद ही खो डालेगा | इस्लाम का दूसरा दृष्टिकोण ये है की चाहे कोई हिन्दू हो या मुसलमान वह सब के सब एक ही पिता आदम की संतान है तथा आपस में भाई - भाई है |
इस्लाम और मुसलमानों के निकट कुफ्र का अर्थ :-
पवित्र कुरआन मजीद एवं हदीस तथा अरबी शब्दकोष में ‘कुफ्र’ का अर्थ “इनकार और छुपाने” का है, इसी शब्द कुफ्र से बना है “काफ़िर” अथार्त छुपाने वाला शब्द काफ़िर बहुत से अर्थो में प्रयोग हुआ है | अरबी भाषा में किसान को भी काफ़िर कहते है, कुरआन मजीद सुरः अलहदीद आयत बीस में किसान का चर्चा हुआ है, क्योंकि किसान बीज को ज़मीन में छुपाता है | इसी तरह रात्रि को भी काफ़िर कहते है क्योंकि रात अपने अँधेरे में संसार की समस्त वस्तुओं को छुपा लेती है , समुन्द्र का दूसरा तट जो नजरो से ओझल है उसे भी काफ़िर कहते है | कुरआन मजीद सुरः अलमुमतहिना आयत चार में इस्लाम धर्म के एक पैगम्बर हजरत इब्राहीम (अ०स०) ने स्वयं को काफ़िर कहा है इब्राहीम (अ०स०) और उनके साथियों ने जब अपने कौम को फसादी रास्तों में उलझा हुआ पाया तो उन्होंने कहा तुम और तुम्हारे फसादी रास्तों से हम बरी हैं एवं तुम्हारे फसादी रास्तों का हम पूरी तरह इन्कार करते हैं, यहाँ पर कुफ्र का शब्द इनकार के अर्थ में प्रयोग हुआ है | बिहार के प्रसिद्ध सूफी बुजुर्ग हजरत यहया सरफुद्दीन मनेरी (र०अ०) ने अपनी पुस्तक “मक्तुबाते सदी” में लिखा है कि सुफियाओं की भाषा में “काफ़िर” खुदा के प्रेम तथा शास्त्र की बात छुपाने वाले को कहते हैं, तथा “मुसलमान” इसे जाहिर और ऐलान करने वाले को कहा जाता है | एक प्रसिद्ध सूफी कवि अमीर खुसरू स्वयं को ‘कफिरे इश्क’ करार देते हुए फ़ारसी में कहते हैं :-
“ कफिरे इश्कम मुसलमानी मोरा दरकार नेस्त , हर रगे जाँतार गुशः हाजत जेनार नेस्त ”
अथार्त में काफिरे इश्क हूँ क्योंकि मैं खुदा की मुहब्बत को अपने छाती में छुपाये रहता हूँ ,मुझे मुसलमान बनने की आवश्यकता नहीं क्योंकि मैं खुदा से की गई पाक मुहब्बत के जज्बात को ऐलान करना मुनासिब नहीं समझता , जब मैं जान चुका हूँ कि मेरे रग में लहू बनकर खुदा के इश्क की लहर दौड़ रही है तो मुझे दिखने वाली जनेऊ के तारो को लपेटने की क्या आवश्यकता है | इसके अतिरिक्त उर्दू काव्य में “काफ़िर प्रेमिका को कहा जाता है ” क्योंकि वह प्रेम देने का प्रण करके शर्माते हुए इनकार करती है |
इस प्रकार कहा जा सकता है कि शब्द “कुफ्र एवं काफिर ” में नगण्यता का भाव नही है अगर ऐसा भाव इस शब्द में विराजमान होता तो ना तो मुसलमान ही शब्द काफिर की संज्ञा स्वीकार करता और ना तो इस्लाम के एक उच्च कोटि के पैगम्बर हजरत इब्राहीम (अ०स०)को पवित्र क़ुरान मजीद में काफिर की संज्ञा से अभिहित किया जाता और ना हि सूफी मत के निकट शब्द काफिर प्रेम का पात्र बन पाता | हिन्दुस्तान के एक बड़े इस्लामिक धर्मगुरु मौलाना अशरफ अली थानवी (र०अ०) कहा करते थे :- “ मैं मुसलमानों को ‘हालन’ (वर्तमान में) और हर काफ़िर को ‘एह्तेमालं’ श्रेष्ठ समझता हूँ | एह्तेमलं का अर्थ ये है कि इस समय वो अल्लाह और उसके आदेश को अस्वीकार कर रहा है परन्तु क्या पता कि  भविष्य में अल्लाह ताला उसको तौबा करने का मार्ग प्रशस्त कर दे जिससे वो कुफ्र एवं काफिर की मुसीबत से निकल जाये तथा अल्लाह ताला उसकी प्रतिष्ठा इतनी बढ़ा दे कि वह मुझ से भी आगे निकल जाये” |
            इन तथ्यों से स्पष्ट है की किसी को नगण्य समझते हुए “काफ़िर” कहना उल्माए इस्लाम (इस्लामिक धर्मगुरु) तथा मुसलमानों का दस्तूर नहीं है | जिन लोगो को शब्द “काफ़िर” से गलत फहमी पैदा हुई है उसकी असल वजह ये है कि इस्लामिक शिक्षा और मुसलमानों के व्यवहारिक जीवन का उन्होंने स्वयं अध्ययन नहीं किया अपितु सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा कर के ऐसा समझ बैठे |
काफिर को गाली ना दो
पवित्र कुरान मजीद ने संसार के समस्त मानवों के मर्यादा एवं गरिमा को बरकरार रखते हुए समस्त मुस्लिमों से आह्वान किया है कि “ऐ मुसलमानों ! ये लोग अल्लाह के अतिरिक्त जिनको पुकारते हैं उन्हें गालियाँ न दो” इस आयत में इनकार करने वाले (काफिर) को भी सम्मान प्रादान करने का आदेश है | स्पष्ट रूप में मना किया गया है कि ऐसी बातें जिनमें व्यंग्य का भाव,निन्दा एवं परिहास  कि बातें निहित हों तुम्हारे लिए वर्जित हैं | अगर कोई मुस्लिम या गैर मुस्लिम कुरान मजीद  की आयतें या उसका अनुवाद किसी वयक्ति विशेष,समुदाय,सम्प्रदाय पर निन्दा करने की भावना तथा उसे हीन दर्शाने के लिए प्रयोग करता है तो उसका ऐसा करना जायज़ नहीं है, क्योंकि कुरान मजीद स्वयं को किताबे हिदायत(मार्ग दर्शक पुस्तक),किताबे रहमत(दयालु पुस्तक) एवं किताबे नूर (प्रकाश वाली पुस्तक) कहा है | शब्द काफिर कुरान मजीद का इस्तेलाही शब्द नहीं है, कुरान ने इस शब्द को हर अवसर पर इनकार के अर्थ में प्रयोग किया है तथा एकेश्वरवाद,इश्दूतत्व एवं परलोक के बुनयादी उसूलों को न मानने वालों के लिए कभी शब्द कुफ्र,कभी शिर्क,तो कभी जिर्म का शब्द प्रयोग किया है | कुफ्र और काफिर का शब्द अगर इस्तेलाही होता तो इसे मुस्लिमों के लिए प्रयोग न किया जाता जिस प्रकार सूरह बक़रह कि आयत दो सौ छप्पन में अंकित है “ जिस किसी ने बढे हुए फसादी का इनकार करके अल्लाह को माना,उसने एक ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटने वाला नहीं ” | इस आयत में शब्द इन्कार (कुफ्र) मुस्लिमों के लिए प्रयोग हुआ है जिसमें कहा जा रहा है की ऐ इमान वालों शैतान के काफ़िर बन जाओ और एक अल्लाह को मानो जो अजन्मा अलख निरंजन है | कुरान ने अरब देश कि प्रथम दो समुदायों को “अहले किताब”(आसमानी किताब वाले) एवं यहूद तथा नसारा (ईसाई) कह कर पुकारा है और ये वो शब्द है जिसको आज भी ये समुदाय अपने लिए प्रयोग करती है |
मुहम्मद (स०अ०व०) ने काफिर का सम्मान किया है  
            हजरत मुहम्मद (स०अ०व०) प्रत्येक मानव को मानवता की निगाह से देखते थे तथा इसी रिश्ते से समस्त मानव का सम्मान करते थे | हुजूर (स०अ०व०) का एक वाक्या सहीह बुखारी शरीफ में इस प्रकार है कि “मदीना में एक मर्तबा रसूलुल्लाह (स०अ०व०) के पास से एक जनाज़ा गुज़रा उस वक्त आप (स०अ०व०) बैठे हुए थे | जनाज़ा को देख कर उसके सम्मान में हुजुर (स०अ०व०) खड़े हो गए, आप के साथ आपके सहाबा (र०त०अ०) भी खड़े हो गए | आप (स०अ०व०) से कहा गया कि ये एक यहूदी गैर मुस्लिम का जनाज़ा था जिसके सम्मान में खड़े होने की आवश्यक्ता नहीं थी | मुहामद (स०अ०व०) ने फरमाया क्या वो इंसान नहीं था ”(बु०श०,भाग-1,पेज न०-175 ) | मुहम्मद (स०अ०व०) ने उस गैर-मुस्लिम को गैर-मुस्लिम कि दृष्टि से नहीं अपितु मानवता कि हैसियत से देखा तथा उसके सम्मान में खड़े हो गए | ये सम्मान मानवता कि एक बहुत बड़ी मिसाल है | ये इस बात को इंगित करती है कि इस्लाम में किसी गैर-मुस्लिम वयक्ति को नगण्य समझने और उसे काफिर कह कर चिढाने और उससे नफरत करने की लेस मात्र भी स्थान नहीं है |
          हजरत मुहम्मद (स०अ०व०) का पाक इरशाद है “सारा जीव अल्लाह का कुन्बा है तथा समस्त जीव में अल्लाह को अत्यधिक पसंद वो वयक्ति है जो उसके कुन्बे से प्रेम करे ” |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें