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बुधवार, 1 जुलाई 2015

मज़हब प्रेम का पक्षधर

मज़हब प्रेम सिखाता है
फिरका परस्ती, धार्मिक उन्माद, धर्मांधता आदि अनेक शब्दों के प्रचार-प्रसार से ऐसा आभास मिलता है कि वर्तमान में समस्त सामाजिक बुराइयों का स्रोत मज़हब या धर्म है | सारी अशांति और अव्यवस्था मज़हब या धर्म की उपज है | परन्तु मज़हब का यह दावा है कि वह समस्त अप्राकृतिक भेद-भावों को समाप्त करके आदर्श मानव तथा आदर्श समाज की रचना करना चाहता है | मज़हब का सन्देश एक ही है जो सत्य है और अटल है,मज़हब समय की कसौटी पर खरा है क्योंकि मज़हब की निर्मल धारा को प्रवाहित करने वाला परमेश्वर जो हज़ारों वर्ष पहले था वही आज भी है और कल भी रहेगा, वही एक अमर है | मज़हब का अर्थ है शुद्ध आचरण का ग्रहण तथा बुरे आचरणों का त्याग | मज़हब की दृष्टि में समस्त मानव एक समान है यहाँ कोई छोटा या बड़ा नहीं होता | यहाँ सब का आदर, सम्मान तथा सत्कार बराबर होता है | मज़हब आपसी भाईचारगी पर बल देता है, दूसरो के लिए मर-मिटने की प्रेरणा तथा दूसरों की पीड़ा को समझने का एहसास देता है | आज का विषय इसी एहसास पर टिका है पवित्र कुरान इस विषय में कहता है “अल्लाह तुमको आदेश देता है न्याय का,सद्व्यवहार का,नातेदारों का हक़ अदा करने का,और मना करता है बुराई एवं अश्लीलता से, अत्यचार एवं ज्यादती से | वह तुम को प्रेरणा देता है ताकि तुम शिक्षा लो (क़ुरआन-16:90) |”
सारे मनुष्य भाई-भाई हैं
“या अय्युहन्नासु इन्ना ख़लक़नाकुम मिन ज़करिउं व उन्सा” हे मनुष्यों ! हमने तुम सबको एक ही पुरुष और स्त्री से पैदा किया है (क़ुरआन-49:13) | ज्ञात हुआ धरती का हर मनुष्य एक दूसरे का भाई है सब एक ही माता-पिता की संतान हैं | इस्लाम के अंतिम पैगम्बर मुहम्मद सल्ल०पाँचों समय के नमाज़ के बाद सदैव पुकारा करते थे “ ऐ अल्लाह, हमारे प्रभु एवं प्रत्येक वस्तु के प्रभु ! मैं गवाही देता हूँ कि एक तू ही प्रभु है | हे अल्लाह, हमारे प्रभु और प्रत्येक वस्तु के प्रभु ! मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद तेरा भक्त और तेरा संदेष्टा है | हे अल्लाह, हमारे प्रभु और प्रत्येक वस्तु के प्रभु ! मैं गवाही देता हूँ कि सारे मनुष्य भाई-भाई हैं (अहमद व अबूदाऊद) |” महाईशदूत मुहम्मद सल्ल० ने यह नहीं बताया कि हमारा ही देश पवित्र और सभ्य है तथा दूसरे देश के निवासी मलेच्छ और दस्यु हैं आपने अपने जीवन के अंतिम हज के अवसर पर जब पूरे अरब देश के लोग मक्का आये थे उनसब को उपदेश करते हुए कहा “ खबरदार ! न अरबवासियों को अन्य देशवासियों पर श्रेष्ठता है, न अन्य देशवासियों को अरबवासियों पर और न गोरों को काले पर श्रेष्ठता है, न कालों को गोरों पर | हाँ किसी को किसी पर श्रेष्ठता है तो केवल उनको है जो धर्म और ईश-भय के कारण दुराचरण से बचते तथा सदाचरण करने को आतुर रहते हैं |” 
भलाई का व्यवहार करो
भलाई मज़हब की अर्धांग्नी है इसके बगैर मज़हब अधूरा है क्योंकि भलाई मानवता को जन्म देती है और मानवता सभ्य समाज को | क़ुरआन मजीद मानवता एवं सभ्य समाज को बरकरार रखने के लिए सभी के साथ सद्व्यवहार की शिक्षा देता है “ और परमेश्वर ही की उपासना करो और किसी वस्तु को उसका समकक्ष न ठराओ | और माता-पिता के साथ,सम्बन्धियों के साथ,अनाथों के साथ,निर्धनों के साथ,निकटवर्ती पड़ोसी के साथ, तथा दूरवर्ती पडोसी के साथ,और पास के सहचरों के साथ,यात्री के साथ, तथा उनके साथ जो तुम्हारे अधीन हों, सब के साथ भलाई का व्यवहार किया करो (क़ुरआन -04:36) |” अंतिम रसूल सल्ल० ने फ़रमाया “ जिस व्यक्ति में तीन बातें होंगी उस पर अल्लाह अपनी कृपा का हाथ रखेगा और उसको जन्नत में प्रवेश करेगा | निर्बलों पर नरमी करना,माँ-बाप से प्रेमपूर्ण व्यवहार करना और दास के साथ भलाई करना (तिरमिज़ी) |” भलाई कि सीमा उस वक़्त समाप्त हो गयी जब मुहम्मद सल्ल० ने कहा “मोमिन ऐसा नहीं होता कि स्वयं पेट भर खाए और उसका पड़ोसी चाहे मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम जो उसके पहलू में रहता हो भूखा रहे  (बुखारी,मुस्लिम ) |”
परनिन्दा से बचो
मानवता में बैर के बीज उस वक़्त पड़ते हैं जब वो दुर्भावनाओं का शिकार हो जाता है इसके उपरान्त वो नेक आचरणों को छोड़ बुरे आचरणों को ग्रहण कर लेता है जिसके परिणाम स्वरूप समाज मे कलह मच जाती है | ऐसी दुर्भावनाओं से बचने हेतु और सभ्य समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए क़ुरआन ने आदेश दिया है “  ऐ आस्थावानों ! कोई पुरुष किसी दूसरे पुरुष की हंसी ना उड़ाए सम्भव है वो उनसे अच्छे हों, और न औरतें दूसरी औरतों का हंसी उड़ाए होसकता है की वो उनसे अच्छी हों | आपस में एक दूसरे पर व्यंग्य न करो और न एक दूसरे को बुरी उपाधि से याद करो | ईमान लाने के बाद दुराचार में नाम पैदा करना बहुत बुरी बात है जो लोग इस नीति से बाज़ न आये वे ज़ालिम हैं | किसी के प्रति अत्यधिक गुमान से बचो क्योंकि अनेक गुमान पाप होते हैं और एक दूसरे की गुप्त जिज्ञासा न किया करो और न एक दूसरे के पीठ पीछे निंदा किया करो| क्या तुममे से कोई इस बात को पसंद करता है कि अपने मुर्दा भाई का मांस खाए | उससे तो तुम अवश्य घृणा करोगे इसलिए परनिंदा न किया करो और इश्वर का भय रखो (क़ुरआन-49:11,12) |
  आम लोगों का ख्याल रखो
हदीस कि एक पुस्तक मिशकात शरीफ में वर्णित है मुहम्मद साहब सल्ल० ने फरमाया “ सारी सृष्टि अल्लाह का परिवार है ; अतः अल्लाह उस व्यक्ति को प्रिय रखता है जो उसके परिवार के साथ भलाई करता है |” आम लोगों का ख्याल रखने के लिए हदीस में इस प्रकार वर्णन आया है कि मुहम्मद सल्ल० ने फरमाया “ प्रलय के दिन इश्वर कहेगा कि ऐ आदम की संतान ! मैं बीमार पड़ा, परन्तु तूने मेरा हाल न पूछा | इंसान निवेदन करेगा ऐ पालनहार ! मैं तेरा हाल कैसे पूछता ? तू तो स्वयं सारी सृष्टि का पालनहार है | इश्वर कहेगा मेरा अमुक बन्दा बीमार हुआ परन्तु तूने उसका हाल न पूछा ! क्या तुझे मालूम नहीं कि यदि तू उसका हाल पूछने जाता तो मुझे उसके पास पाता | फिर पूछेगा ऐ आदम की संतान ! मैंने तुझ से खाना माँगा परन्तु तूने मुझे खाना न दिया | मनुष्य निवेदन करेगा ऐ पालनहार ! मैं तुझे भोजन कैसे देता ? तू तो स्वयं सारी सृष्टि का पालनहार है | इश्वर कहेगा मेरे अमुक बंदे ने तुझ से खाना माँगा परन्तु तूने उसे खाना नहीं दिया क्या तू नहीं जानता कि यदि तू उसे खाना देता तो उसका पुण्य मुझ से पाता | फिर पूछेगा ऐ आदम की सन्तान मैंने तुझ से पानी माँगा परन्तु तूने मुझे पानी नहीं पिलाया मनुष्य निवेदन करेगा ऐ पालनहार ! मैं तुझे पानी क्या देता ? तू तो स्वयं सारी सृष्टि का पालनहार है | इश्वर कहेगा मेरे अमुक बन्दे ने तुझ से पानी माँगा परन्तु तूने उसे पानी न दिया क्या तू नहीं जानता कि यदि तू उसे पानी पिला देता तो उसका पुण्य मुझसे पाता (मुस्लिम) |”
            इस प्रकार मज़हब आपसी भाईचारगी को बढवा देता तथा एक दूसरे को आपस में प्रेम-पूर्ण भावनाओं से बांधता है | आदर्श समाज के निर्माण में मज़हब प्रीत का ऐसा मिठास घोलता है जिसके प्रेम रूपी मीठेपन के सामने दुर्व्यवहार,कटु-वचन,आपसी कलह,हीन भावना,परनिन्दा,सम्प्रदायिकता,द्वेष भावना जैसी समस्त चीजें दम तोड़ देती है | शायद इसलिए अल्लामा इक़बाल ने कहा है “ मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना |” 

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